नई दिल्ली,
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेश दिया है कि वह जासूसी और देशद्रोह के आरोपों से बरी हुए प्रदीप कुमार को अतिरिक्त जिला न्यायाधीश (एडीजे) के रूप में नियुक्त करे. कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया कि 15 जनवरी 2025 तक कुमार को नियुक्ति पत्र जारी किया जाए. प्रदीप कुमार ने 2016 में उत्तर प्रदेश उच्चतर न्यायिक सेवा परीक्षा पास की थी और 2017 में चयन सूची में उनका नाम शामिल था. हालांकि, उन पर पहले जासूसी और देशद्रोह के गंभीर आरोप लगाए गए थे, जिसके चलते उनकी नियुक्ति रोक दी गई.
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता को इन मामलों में ‘सम्मानपूर्वक बरी’ किया गया है और अभियोजन पक्ष की कहानी में कोई सच्चाई नहीं पाई गई. अदालत ने राज्य सरकार की देरी पर नाराजगी जताते हुए कहा, ‘ऐसे व्यक्ति को जिसने खुद को अदालत में निर्दोष साबित किया है, नियुक्ति से वंचित रखना संविधान और कानून का उल्लंघन है.’
क्या था मामला?
प्रदीप कुमार पर 2002 में कानपुर के कोतवाली पुलिस स्टेशन में दो मुकदमे दर्ज हुए थे. पहला मामला जासूसी के आरोपों के तहत (आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम की धाराएं 3, 6 और 9) और दूसरा मामला देशद्रोह (आईपीसी की धारा 124ए) से जुड़ा था. 2014 में कानपुर नगर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने दोनों मामलों में उन्हें बरी कर दिया. अदालत ने पाया कि इन मामलों में अभियोजन पक्ष कोई भी ठोस सबूत पेश नहीं कर सका. इसके बावजूद, उनकी नियुक्ति प्रक्रिया पर आरोपों की छाया बनी रही.
कोर्ट का सख्त रुख
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई भी ऐसा सबूत नहीं है जो उसे विदेशी एजेंसी से जुड़े होने की पुष्टि करे. अदालत ने कहा, ‘सिर्फ खुफिया एजेंसियों के ‘रडार’ पर होना किसी व्यक्ति के दोषी होने का प्रमाण नहीं हो सकता.’ कोर्ट ने यह भी साफ किया कि याचिकाकर्ता के पिता पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप उनके चयन में बाधा नहीं बन सकते. अदालत ने टिप्पणी की, ‘किसी व्यक्ति को उसके परिवार के किसी सदस्य की गलतियों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.’
