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बीजेपी MLA मिश्री लाल यादव को 2 साल की सजा, कोर्ट ने लगाया एक लाख का जुर्माना, अब विधायकी पर संकट!

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दरभंगा:

दरभंगा स्थित एमपी-एमएलए कोर्ट ने मंगलवार को एक आपराधिक मामले में बड़ा फैसला सुनाया। अलीनगर से भाजपा विधायक मिश्री लाल यादव और सुरेश यादव को कोर्ट ने दोषी ठहराया। दोनों को भारतीय दंड संहिता की धारा 506 के तहत दो-दो साल की सजा सुनाई गई है, साथ ही एक-एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। यह फैसला 2019 में दर्ज एक मारपीट और लूटपाट के मामले के तहत आया है, जिससे विधायक मिश्री लाल यादव की विधायकी पर भी संकट गहराता नजर आ रहा है।

हाई कोर्ट में अपील करूंगा: विधायक
मंगलवार की दोपहर करीब 4 बजे विधायक मिश्री लाल यादव और सुरेश यादव को पुलिस सुरक्षा में कोर्ट में पेश किया गया। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने सजा सुनाई। फैसले के बाद विधायक मिश्री लाल यादव ने कहा, ‘मैं न्यायालय का सम्मान करता हूं और इस फैसले के विरुद्ध पटना हाई कोर्ट में अपील करूंगा।’

‘प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर एक्ट’ की मांग खारिज
दोषियों के वकील ने कोर्ट से अपील की थी कि उन्हें ‘प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर एक्ट’ के तहत राहत दी जाए, ताकि उन्हें जेल भेजने के बजाय सुधार का मौका मिल सके। लेकिन कोर्ट ने इस मांग को खारिज कर दिया। कोर्ट का मानना था कि अभियुक्त जनप्रतिनिधि हैं और कानून बनाने वाले होने के बावजूद उन्होंने अपराध किया है, इसलिए उन्हें इस कानून का लाभ नहीं दिया जा सकता।

तीन महीने की सजा से शुरू हुआ था मामला
इससे पहले कोर्ट ने इस मामले में दोनों आरोपियों को तीन-तीन महीने की सजा और पांच-पांच सौ रुपये जुर्माने की सजा दी थी। मामला दरभंगा के केवटी प्रखंड अंतर्गत समैला गांव का है, जहां रहने वाले उमेश मिश्र ने 30 जनवरी 2019 को एफआईआर दर्ज करवाई थी।

क्या है मामला?
एफआईआर के अनुसार, 29 जनवरी 2019 की सुबह जब उमेश मिश्र टहल रहे थे, तभी कदम चौक पर मिश्री लाल यादव, सुरेश यादव और करीब 20-25 अन्य लोगों ने उन्हें घेर लिया और गाली-गलौज की। विरोध करने पर मिश्री लाल यादव ने फरसे से उनके सिर पर वार किया, जिससे गंभीर चोटें आईं। वहीं सुरेश यादव ने रॉड और लाठी से मारपीट की और उमेश मिश्र की जेब से 2300 रुपये निकाल लिए।

फैसले से उठे सियासी सवाल
इस मामले में कोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर मिश्री लाल यादव और सुरेश यादव को दोषी पाया और सजा सुनाई। अब मिश्री लाल की विधायकी भी खतरे में पड़ सकती है, क्योंकि दो साल की सजा से जनप्रतिनिधि के रूप में उनकी वैधता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है।

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