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चीफ जस्टिस गवई के पहले फैसले से पूर्व सीएम नारायण राणे ‘क्लीन बोल्ड’ , महाराष्ट्र में गरमा सकती है राजनीति

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मुंबई/नई दिल्ली

महाराष्ट्र से ताल्लुक रखने वाले जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई (बी आर गवई) के सुप्रीम कोर्ट की बागडोर संभालने के बाद बीजेपी नेता और पूर्व सीएम नारायण राणे को करारा झटका लगा है। यह महज संयोग है कि गवई के सीजेआई बनने के बाद महाराष्ट्र के कद्दावर नेता नारायण राण पहली गेंद पर बोल्ड हो गए हैं। गुरुवार को सीजेआई ने अपने पहले फैसले में महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता नारायण राणे के राजस्व मंत्री रहते लिए गए एक फैसले को निरस्त कर दिया। राणे पर आरोप है कि उन्होंने अपने करीबी बिल्डर को पुणे जिले की वन विभाग की 30 एकड़ जमीन दी थी।

गरमा सकती है राजनीति
सीजेआई ने उक्त जमीन वन विभाग को वापस कर देने के आदेश देते हुए कहा कि देश भर में ऐसे सभी मामलों की जांच होनी चाहिए जहां नेता-अफसर-बिल्डर मिलीभगत है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले महाराष्ट्र के राजनीतिक हलकों में हड़कंप की स्थिति है। नारायण राणे मोदी 2.0 में केंद्रीय मंत्री थी। इस बार वह मंत्री नहीं है लेकिन लोकसभा चुनाव जीतने में सफल रहे हैं। वह रत्नागिरी-सिंधुदुर्ग से लोकसभा सदस्य हैं। उनके बड़े बेटे नीलेश राणे शिवसेना से विधायक है तो छोटा बेटा नितेश राणे बीजेपी से फडणवीस सरकार में मंत्री हैं।

राणे को सीधा झटका
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को नारायण राणे के लिए सीधा झटका माना जा रहा है। चूंकि अब वह बीजेपी में हैं। ऐसे मे इस मुद्दे परमहायुति में भी राजनीतिक बवाल शुरू होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। फडणवीस सरकार में अभी राजस्व मंत्री की जिम्मेदारी प्रदेश अध्यक्ष चंद्रशेखर बावनकुले के हाथों में हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकिर विपक्ष में खास तौर से उद्धव ठाकरे की पार्टी को राणे पर आक्रमक हो सकती है।

मनोहर जोशी थे तब मुख्यमंत्री
मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई ने राजनेताओं और बिल्डरों के नेक्सस को लेकर भी कड़ी फटकार लगाई है। उन्होंने कहा कि वन विभाग द्वारा पुणे में 30 एकड़ जमीन एक बिल्डर को देने का फैसला इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि किस तरह राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी, निजी बिल्डरों के साथ मिलकर काम करते हैं। यह पूरा मामला जुलाई से अगस्त 1998 के आसपास का है। तब मनोहर जोशी राज्य के मुख्यमंत्री थे। इसके बाद नारायण राणे राज्य के सीएम बने थे।

सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उस वक्त पर जिस तेज गति से भूमि उपयोग बदला गया। उससे साफ है कि तत्कालीन राजस्व मंत्री इसमें शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह जांच करने का निर्देश भी दिया कि क्या किसी निजी पक्ष को गैर-वनीय गतिविधियों के लिए वन भूमि आवंटित की गई है। अगर ऐसा हुआ है तो आरक्षित भूमि को वन विभाग को वापस सौंप दिया जाए। नारायण राणे महाराष्ट्र के 15 जून, 1996 से लेकर 1 फरवरी, 1999 तक राजस्व मंत्री रहे थे।

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