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‘पीड़ित हूं, आतंकी नहीं’, रिहाई के बाद बोले राजीव के हत्यारे रविचंद्रन

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नई दिल्ली,

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्याकांड में दोषी रविचंद्रन ने जेल से छूटने के बाद कहा कि नॉर्थ इंडिया के लिए लोगों को उन्हें किसी आतंकी या मर्डरर के रूप में नहीं बल्कि पीड़ित के रूप में देखना चाहिए. न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक, रविचंद्रन ने कहा कि नॉर्थ इंडिया के लोगों को हमें आतंकवादी या हत्यारे के बजाय पीड़ित के रूप में देखना चाहिए. समय और शक्ति निर्धारित करती है कि कौन आतंकवादी या स्वतंत्रता सेनानी है. करीब 3 दशक बाद जेल से बाहर आने पर रविचंद्रन ने कहा समय हमें निर्दोष के रूप में आंकेगा, भले ही हम आतंकवादी होने के लिए दोषी हों.

सुप्रीम कोर्ट ने रविचंद्रन, नलिनी श्रीहरन और अन्य को यह कहते हुए आजीवन कारावास से रिहा कर दिया कि उन सभी छह ने अपराध के संबंध में अपनी सजा पूरी कर ली है. रविचंद्रन ने राजीव गांधी की हत्या के पीछे एक ‘बड़ी साजिश’ का हिस्सा होने से भी इनकार किया है.
रविचंद्रन ने इंडिया टुडे से कहा कि हमने तमिल गौरव और तमिल आंदोलन के लिए कुछ चीजें की हैं, लेकिन हम पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की साजिश में शामिल नहीं हैं. हमने ऐसा कुछ नहीं किया जिसके लिए उम्रकैद या मौत की सजा मिले.

सुप्रीम कोर्ट ने बीते दिनों संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्ति का उपयोग करते हुए इस साल 18 मई को पेरारिवलन को रिहा करने का आदेश दिया था, जिन्होंने 30 साल से अधिक जेल की सजा काट ली थी. बीते शुक्रवार को शीर्ष अदालत ने कहा कि उसका पिछला आदेश अन्य सभी दोषियों पर समान रूप से लागू होता है.

1991 में हुई थी राजीव गांधी की हत्या
21 मई 1991 को एक चुनावी रैली के दौरान तमिलनाडु में एक आत्मघाती हमले में राजीव गांधी की हत्या कर दी गई थी. उन्हें एक महिला ने माला पहनाई थी, इसके बाद धमाका हो गया. इस हादसे में 18 लोगों की मौत हुई थी.

इस मामले में 41 लोगों को बनाया गया था आरोपी
इस मामले में कुल 41 लोगों को आरोपी बनाया गया था. 12 लोगों की मौत हो चुकी थी और तीन फरार हो गए थे. बाकी 26 पकड़े गए थे. इसमें श्रीलंकाई और भारतीय नागरिक थे. फरार आरोपियों में प्रभाकरण, पोट्टू ओम्मान और अकीला थे. आरोपियों पर टाडा कानून के तहत कार्रवाई की गई. सात साल तक चली कानूनी कार्यवाही के बाद 28 जनवरी 1998 को टाडा कोर्ट ने हजार पन्नों का फैसला सुनाया. इसमें सभी 26 आरोपियों को मौत की सजा सुनाई गई.

19 दोषी पहले हो चुके थे रिहा
ये फैसला टाडा कोर्ट का था, इसलिए इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. टाडा कोर्ट के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती थी. एक साल बाद सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने इस पूरे फैसले को ही पलट दिया. सुप्रीम कोर्ट ने 26 में से 19 दोषियों को रिहा कर दिया. सिर्फ 7 दोषियों की फांसी की सजा को बरकरार रखा गया था. बाद में इसे बदलकर उम्रकैद किया गया.

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