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मोदी सरकार फासिस्ट नहीं, सीपीएम जैसे वाम दल ने अचानक क्यों बदला रुख, केरल में बदले समीकरण को समझिए

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तिरुवनंतपुरम

सीपीआई (एम) बीजेपी सरकार को फासिस्ट यानी फासीवादी या नियो फासिस्ट नहीं मानती। सीपीएम के नोट में कथित तौर पर इस एक लाइन पर केरल की सियासत में तूफान मचा है। कांग्रेस चिंतित है कि आरएसएस समर्थक वोटर अब सिर्फ एलडीएफ को हराने के लिए कांग्रेस को वोट नहीं करेंगे। दूसरी ओर, सीपीएम के सेंट्रल कमेटी के सदस्य ए के बालन ने कहा कि हमारी पार्टी ने कभी भी बीजेपी सरकार का मूल्यांकन फासीवादी शासन के रूप में नहीं किया है। हमने कभी नहीं कहा कि फासिज्म आ गया है। सवाल यह है कि केरल के सबसे बड़े वाम दल का मिजाज अचानक क्यों बदला?

राजनीति के चतुर खिलाड़ी हैं पिनाराई विजयन
केरल में एक साल बाद 2026 होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए बिसात बिछाए जा रहे हैं। कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ के पास 10 साल बाद सत्ता हासिल करने का मौका है तो वाम दलों के गुट एलडीएफ के सामने कुर्सी बचाने की चुनौती है। दक्षिण भारत के राज्य केरल के सीएम सीपीएम नेता पिनराई विजयन ऐसे वामपंथी नेता हैं, जिसे विरोधी चतुर खिलाड़ी मानते हैं। कई आलोचकों का कहना है कि पिनराई विजयन खुद को कामरेड से ज्यादा बॉस सुनना ज्यादा पसंद है और वह सत्ता बचाने के लिए विचारधारा के साथ साम-दाम भी आजमाते हैं। वह बीजेपी के कट्टर वैचारिक विरोधी हैं, मगर नरेंद्र मोदी स्टाइल में चुनाव लड़ने के तौर-तरीके आजमाने में उन्हें कोई परहेज नहीं है। मोदी भी कई बार विरोधी नेताओं की तारीफ खुलेआम करते हैं।

बीजेपी केरल में फैली तो एलडीएफ को नुकसान
केरल विधानसभा चुनाव से पहले फासिस्ट और नियो फासिस्ट का मुद्दा छिड़ा है, उसे पिनराई विजयन की चुनावी रणनीति माना जा रहा है। कांग्रेस नेता रमेश चेन्नीथला ने भी कहा कि सीपीएम का नोट अप्रैल 2026 में होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों में बीजेपी समर्थकों के वोट हासिल करने की पार्टी की रणनीति का हिस्सा था। कांग्रेस नेताओं की आशंका काफी हद तक सही है। केरल में बीजेपी जिस तेजी से पैर पसार रही है, वह एलडीएफ को टेंशन देने के लिए काफी है। 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने केरल में अपना खाता खोल दिया है। अगर बीजेपी के वोटर बढ़े तो सर्वाधिक नुकसान वाम दलों को ही होगा। 10 साल की एंटी इम्कबेंसी से निपटने के लिए जरूरी है कि बीजेपी और कांग्रेस की ओर झुक रहे वोटर लेफ्ट के सपोर्ट में वोटिंग करें।

वोट प्रतिशत से समझिए बीजेपी की तारीफ क्यों?
2021 के चुनावों में विजयन के नेतृत्व वाले एलडीएफ लगातार दूसरी बार सत्ता में लौटा। वाम दलों ने विधानसभा की 140 में से 99 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ को 41 सीटें मिलीं। हालांकि, वाम दलों को 2024 के लोकसभा चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ा। एलडीएफ को 20 में से सिर्फ एक सीट मिली। 18 सीटें कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने जीती। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ को 45.21 प्रतिशत और वामपंथी दलों को 33.34 प्रतिशत वोट मिले थे। बीजेपी और उसके सहयोगियों को 19.24 प्रतिशत वोट मिले थे, जो 2021 के विधानसभा चुनाव से करीब 7 फीसदी ज्यादा थे। विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 11.30 फीसदी और एनडीए को 12.41 फीसदी वोट मिले थे। लोकसभा में बीजेपी के वोट बढ़ने का नुकसान एलडीएफ को हुआ।

पिछले चुनाव में कांग्रेस और सीपीएम को बराबर वोट
लोकसभा चुनाव में एलडीएफ को यूडीएफ के मुकाबले करीब 12 फीसदी कम वोट मिले। विधानसभा चुनाव में एलडीएफ को कांग्रेस से 6 फीसदी ज्यादा वोट मिले थे। एलडीएफ कम मार्जिन से आगे बढ़ी मगर सीटों में ज्यादा फायदा मिल गया। दिलचस्प यह है कि 2021 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और सीपीएम को करीब-करीब बराबर वोट मिले थे। तब सीपीएम को 25.38 और कांग्रेस को 25.12 प्रतिशत वोट शेयर मिला था। बदले राजनीति परिदृश्य में बीजेपी भी अपनी ताकत बढ़ा रही है।

केरल में आरएसएस मजबूत, समीकरण समझिए
आरएसएस पहले ही केरल में मजबूत है। राज्य में वोटरों का ऐसा वर्ग है, जो वैचारिक रूप से बीजेपी के साथ है मगर चुनाव में एलडीएफ को हराने के लिए कांग्रेस को वोट करता रहा है। अब जैसा कि शशि थरूर के बीजेपी में आने की चर्चा है। अगर ऐसा हुआ तो 2026 के चुनाव में समीकरण और बदल जाएंगे। ऐसे समय में पिनाराई विजयन बड़ी चालाकी से वोटरों को संदेश देना चाहते हैं कि राज्य में सीपीएम की सरकार बनने के बाद भी केंद्र में नरेंद्र मोदी से उनके रिश्ते बुरे नहीं होंगे। अगर उनका संदेश वोटरों तक पहुंच गया तो विजयन के लिए कांग्रेस से मुकाबला आसान हो जाएगा। दूसरी ओर कांग्रेस की टेंशन यह है कि अगर लेफ्ट पार्टियां भी भगवा दल की कड़ी आलोचना करना बंद कर देंगी तो आरएसएस समर्थक एलडीएफ को हराने में ज्यादा रुचि नहीं लेंगे। उनकी कोशिश बीजेपी को जिताने की होगी।

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