रांची
झारखंड विधानसभा चुनाव 2024 के दौरान बीजेपी को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। भाजपा के प्रदेश राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष और प्रदेश प्रभारी लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने चुनाव में पार्टी की करारी हार की समीक्षा की। इस दौरान हारे हुए प्रत्याशियों ने कहा कि मंईयां सम्मान योजना, जेएलकेएम की ओर वोट काटने और भितरघात ने खेल बिगाड़ा। वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि झारखंड आदिवासी बहुल क्षेत्रों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का संगठन कमजोर हो गया है।
भितरघात के कारण पार्टी प्रत्याशियों को हुआ नुकसान!
चुनाव में पार्टी की करारी हार की समीक्षा के पहले दिन प्रत्याशियों की ओर से हार के कारणों के बारे में नेतृत्व को जानकारी दी। वहीं दूसरे दिन रविवार को भी प्रदेश पदाधिकारियों, जिलाध्यक्षों, प्रभारियों और चुनाव प्रबंधन समिति की ओर से अपनी बात रखी गई। गिरिडीह सीट से चुनाव में पराजित बीजेपी प्रत्याशी निर्भय शाहाबादी ने कहा कि वो विश्वासघात के शिकार हुए। वहीं देवघर के प्रत्याशी रहे नारायण दास ने कहा कि- मुझे अपनों ने लूटा, गैरों में कहां दम था। कुछ प्रत्याशियों ने अपने क्षेत्र के सांसदों के सहयोग को भी हार का बड़ा कारण बताया, वहीं कुछ ने आजसू पार्टी कार्यकर्ताओं पर जेएमएम प्रत्याशी के लिए काम करने का आरोप लगाया। समीक्षा बैठक के दौरान मंईयां सम्मान योजना और जेएलकेएम की भूमिका पर भी नेताओं ने अपनी बातें रखी।
गोगो दीदी योजना काट नहीं बन सकी
बैठक के दौरान हारे हुए प्रत्याशियों ने बताया कि बीजेपी की गोगो दीदी योजना इंडिया गठबंधन के ‘मंईयां सम्मान योजना’ का काट नहीं बन सकी। हेमंत सरकार ने चुनाव से हार महीने पहले मंईयां योजना की शुरुआत की। इसके तहत गरीब महिलाओं के खाते में प्रति महीने एक-एक हजार रुपये का भुगतान किया गया। इसके काट में बीजेपी की ओर से गोगो दीदी योजना की घोषणा की गई, लेकिन इसका असर नहीं दिखा
सीटें कम होने के बावजूद बीजेपी का वोट प्रतिशत बढ़ा
समीक्षा बैठक के दौरान पदाधिकारियों की ओर से यह भी कहा गया है कि इस चुनाव में बीजेपी का वोट प्रतिशत बढ़ा है। लगभग नौ लाख वोट बढ़े। पार्टी की ओर से अब अगले सप्ताह से सदस्यता अभियान की भी शुरुआत की जा रही है।
आदिवासी इलाकों में कमजोर हुआ संघ!
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव में भी झारखंड के आदिवासियों ने भाजपा का साथ नहीं दिया। आदिवासियों के लिए आरक्षित 28 में से केवल एक सीट भाजपा को मिली। पूर्व सीएम चंपाई सोरेन अपनी वजह से जीत सके। ऐसे परिणाम की उम्मीद किसी को नहीं थी. आदिवासियों को अपने साथ जोड़ने की तमाम कोशिशें बेकार हो गई।
