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ऊंची बिल्डिंग और सोसायटी में नहीं पहुंचे सर्वेयर, लोगों को उपजाति मालूम नहीं, कर्नाटक जातीय जनगणना रिपोर्ट पर सवाल

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बेंगलुरु

कर्नाटक में 10 साल पहले हुए जातीय जनगणना के आंकड़ों को सीएम सिद्धारमैया ने 95 प्रतिशत सही करार दिया है। 17 अप्रैल को हुई कर्नाटक कैबिनेट की बैठक में इस पर सहमति नहीं बनी। वोक्कालिगा और लिंगायत समुदाय के मंत्रियों ने इस डेटा को गलत बताते हुए चेतावनी दी कि अगर इस जातीय जनगणना रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण की सीमा तय की गई तो राज्य में अशांति का दौर शुरू हो जाएगा। इस पर अगली चर्चा 2 मई को होगी। इस बीच मीडिया रिपोर्टस में भी सर्वे के विसंगतियों की चर्चा हो रही है। 2015 में जब सर्वे किया गया, तब अधिकतर लोग सर्वे के लिए बनाए कैटिगरी और सब कैटिगरी के वाकिफ नहीं थे। इसके अलावा कई चुनौतियां थीं, जिस पर सवाल खड़े हुए।

उप जातियों के कैटिगरी से भ्रम, आंकड़ों पर शक
2015 में कर्नाटक राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष एच. कांथराज ने सामाजिक-आर्थिक और शैक्षिक सर्वेक्षण शुरू किया था। इस सर्वे में 5.9 करोड़ लोगों और 1.3 करोड़ घरों को शामिल किया गया था। आयोग ने तीन साल बाद 2018 में सर्वे पूरा कर लिया, लेकिन रिपोर्ट सालों तक दबी रही। बाद में जयप्रकाश हेगड़े की अध्यक्षता वाले एक अन्य आयोग ने कांथराज आयोग के डेटा के आधार पर संशोधित रिपोर्ट पेश की। फाइनल रिपोर्ट में वोक्कालिगा और लिंगायत समुदाय का आबादी दावों से कम बताई गई और विवाद शुरू हुआ। बीजेपी समेत इन समुदायों के नेताओं ने आरोप लगाया कि सर्वे में वोक्कालिगा और लिंगायत समुदाय में उप जातियों की कई सारी कैटिगरी बनाई गई, जिससे सटीक डेटा सामने नहीं आया। उनका आरोप है कि सर्वे में उप जातियों की आबादी के बारे में डेटा को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है।

हाईराइज बिल्डिंग और फ्लैट तक नहीं पहुंचे सर्वेयर
टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, सर्वे के दौरान कई ऐसी शिकायतें आईं, जिससे आंकड़े संदेह के घेरे में आ गए। कुछ लोगों ने शिकायत की है कि पिछले एक दशक में कोई भी कर्मचारी जाति के बारे में पूछताछ करने उनके घर नहीं आया। सर्वे करने वालों को शहरी क्षेत्रों के हाईराइज बिल्डिंग और गेटेड सोसायटी में एंट्री नहीं मिली, जहां इन दोनों समुदाय के लोगों की बाहुल्यता है। राजाजीनगर में सर्वे करने वाले एक कर्मचारी ने बताया कि उन्हें डेटा कलेक्शन के लिए बड़े-बड़े एरिया की जिम्मेदारी दी गई थी। बेंगलुरु जैसे शहर में उन्हें कई बार फ्लैटों में एंट्री नहीं मिली। कई जगहों पर लोग अपनी जाति बताने को तैयार नहीं थे।

लोगों को पता ही नहीं कि उनकी उपजाति क्या है?
दावनगेरे के एक फील्ड ऑफिसर ने भी ऐसे ही प्रॉब्लम बताए। उन्होंने बताया कि सर्वे में उप जाति की कैटिगरी के आधार पर फॉर्म भरना था। अधिकतर लोगों को यह पता ही नहीं था कि उनकी उपजाति क्या है? जाति के वर्गीकरण को लेकर भी काफी भ्रम था, इस कारण लोगों ने गोलमटोल जवाब दिए, फिर डेटा मैन्युअल तरीके से भरा गया। मैसूर के रिसर्चर एसके मूर्ति ने कहा कि सरकार को पहले प्राइमरी डेटा को जारी करना चाहिए । उन्होंने कहा कि पारदर्शिता महत्वपूर्ण है। अगर कोई त्रुटि है, तो इस पर खुले तौर पर बहस होनी चाहिए। स्वतंत्र डेटा ऑडिटरों को लाया जाना चाहिए क्योंकि अभी भी सुधार करने की गुंजाइश है।

सिद्धारमैया ने किया समर्थन, बीजेपी का विरोध
सिद्धारमैया ने हाल ही में घोषणा की कि रिपोर्ट का 95 फीसदी हिस्सा सटीक है। बिना जांच किए इसे अनसाइंटिफिक नहीं कहना चाहिए। उन्होंने कहा कि सरकार शहरी डेटा की दोबारा जांच के लिए एक पैनल का गठन कर सकती है। इस बीच राज्य बीजेपी अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने कहा कि कांग्रेस सरकार ने सर्वे के नाम पर 150 करोड़ रुपये से अधिक बर्बाद कर दिए। यह सर्वेक्षण ठीक से नहीं किया गया। जैन और पिछड़े वर्गों सहित कई समुदाय रिपोर्ट में दिखाए गए आंकड़ों का विरोध कर रहे हैं।

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