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Wednesday, March 11, 2026
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बिहार में आखिर नीतीश कुमार के आगे सरेंडर करती क्यों दिख रही है BJP?

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नई दिल्ली/पटना

नीतीश कुमार ने एक बार फिर भाजपा से रिश्ता तोड़ दिया है। थोड़ी देर में वह राज्यपाल से मिलने वाले हैं और बिहार की सियासी तस्वीर पलट जाएगी। कुछ घंटे पहले तक खामोश बैठीं विपक्षी पार्टियां जोश में आ गई हैं। नीतीश दोस्ती भूल, मन में तल्खी लिए मोदी से फिर दूर चले गए हैं, पर ये सब अचानक नहीं हुआ। नीतीश कुमार की नाराजगी के संकेत उसी समय से मिलने लगे थे जब वह राष्ट्रपति के शपथ ग्रहण में नहीं पहुंचे। वह रामनाथ कोविंद के विदाई समारोह से भी दूर रहे। हाल में नीति आयोग की बैठक पीएम मोदी ने ली, लेकिन नीतीश कुमार उपस्थित नहीं रहे। पटना में उन्होंने अमित शाह से मुलाकात नहीं की। इधर, JDU ने जब अपने पूर्व अध्यक्ष आरसीपी सिंह को भ्रष्टाचार के आरोपों में नोटिस जारी किया तो उधर से इस्तीफा आ गया। जेडीयू की तरफ से कहा जाने लगा कि वह पार्टी में रहते हुए बीजेपी की तरफ से बैटिंग कर रहे थे।

कहा यह भी जाने लगा कि महाराष्ट्र की तरह बिहार में भी पासा पलट सकता है। एकनाथ शिंदे की भूमिका में आरसीपी सिंह आ सकते हैं और भाजपा सपोर्ट कर सकती है। ये सब अटकलबाजी चल ही रही थी कि नीतीश कुमार ने नई संभावनाएं तलाशनी शुरू कर दीं। पिछले 24 घंटे में तेजी से घटनाक्रम बदले, पता चला कि रात में नीतीश के प्रतिनिधि और तेजस्वी के बीच डील हुई और सुबह तस्वीर साफ हो गई। ऐसे वक्त में सियासी दांवपेच को समझने वाले लोग यह देखकर हैरान हैं कि आखिर ‘सियासी चाणक्यों’ वाली भगवा पार्टी ने बिहार में सत्ता में बने रहने के लिए कुछ क्यों नहीं किया?क्या भाजपा मानकर चल रही है कि बिहार में उसके पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं? आइए 4 पॉइंट्स में समझते हैं कि भाजपा के मन में क्या है और वह बड़े आराम से नीतीश कुमार को सेफ पैसेज क्यों दे रही है।

1. JDU को तोड़ने की कोशिश नहीं
कहते हैं सियासी जंग में योद्धा हर दांव आजमाने की कोशिश करता है। लेकिन बिहार की सत्ता से बाहर हो रही भाजपा ने पिछले 24 घंटों में स्पष्ट संकेत दिया कि वह नीतीश कुमार को उनके मन की करने देगी। वह जेडीयू को तोड़ने की कोशिश नहीं करेगी। अंदरखाने से बातें छनकर आईं कि नई सरकार को गिराने का कोई प्रयास नहीं किया जाएगा बल्कि उनसे जवाब मांगा जाएगा।

2. वेट एंड वॉच की रणनीति
दरअसल, नीतीश कुमार के एनडीए से अलग होने, मोदी से पहले की नाराजगी, पहले की महागठबंधन सरकार का हश्र देखते हुए भाजपा के लिए सबसे मुफीद स्थिति यही बन रही है कि वह सियासी घटनाक्रम पर वेट एंड वॉच की भूमिका में बनी रहे। उसे बिहार में फिलहाल अपने लिए कुछ ज्यादा स्कोप नहीं दिख रहा है। यही वजह है कि जैसे गठबंधन टूटने की बात पुख्ता होने लगी और नीतीश कुमार ने राज्यपाल से मिलने का वक्त मांगा, भाजपा कोटे के सभी 16 मंत्रियों के भी इस्तीफा देने की खबरें भी तैरने लगीं।

3. पर आगे शांत नहीं बैठेगी
जब दोस्ती टूटती है तो तल्खी बढ़ती है। फिर जिन मुद्दों पर फायदा होता दिखता है, उन्हें फिर से खोदा जाता है। सरकार की खामियों और कमजोरियों को उछाला जाता है। जाहिर है कि नीतीश की नई सरकार पर भाजपा की तरफ से हमले जोरदार रहेंगे। ढाई साल में चुनाव है और पिछली बार आरजेडी के दामन पर लगे दाग के चलते जिस तरह से नीतीश कुमार ने इस्तीफा दिया था, उस माहौल को भाजपा फिर से उजागर करेगी। वह पीएम मोदी के उन ट्वीट्स का भी जिक्र कर सकती है जिन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को लेकर नीतीश कुमार की प्रशंसा की थी। इससे वह अंतर को भी जनता के सामने पेश करेगी।

4. बिहार में महाराष्ट्र पार्ट-2
नीतीश सरकार से अलग होने के बाद भाजपा के लिए खुलकर खेलने का मौका होगा। वह जोर-शोर से इस बात को प्रचारित करेगी कि नीतीश कुमार ने महाराष्ट्र की उद्धव सरकार की तरह जनादेश का अपमान किया है। दरअसल, बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में एनडीए को 125 सीटें मिली थीं। नीतीश की पार्टी नुकसान में रही थी और उसकी 28 सीटें घट गई थीं। भाजपा को 21 सीटों का फायदा हुआ था। बिहार में भाजपा जेडीयू से बड़ी पार्टी बन गई लेकिन बड़ा दिल दिखाते हुए भगवा पार्टी ने नीतीश को सीएम की कुर्सी सौंप दी। अब इन सब बातों को नैतिकता और गठबंधन धर्म के पैमाने पर कसते हुए भाजपा जेडीयू पर हमले करने से नहीं चूकेगी।

बिहार बीजेपी के कुछ नेता भी बोल रहे हैं कि उन्हें इस बात की आशंका तो पहले से थी कि नीतीश पलटी मार सकते हैं लेकिन इतनी जल्दी उम्मीद नहीं थी। उधर, सूत्रों की मानें तो जेडीयू का प्रभाव बढ़ाने के लिए नीतीश कुमार भाजपा के आगोश से बाहर निकलना चाह रहे थे। कुछ लोग तो इसमें नीतीश कुमार की राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को भी जोड़ रहे हैं।

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