नई दिल्ली
भारतीय विदेशों में जमकर खर्च कर रहे हैं। पिछले एक दशक में इसमें 29 गुना बढ़ोतरी हुई है। इसकी तुलना में फॉरेन रेमिटेंस में बहुत कम इजाफा हुआ है। रेमिटेंस का मतलब उन पैसों से है जो विदेश में काम करने वाले भारतीय कामगर स्वदेश भेजते हैं। वित्त वर्ष 2014 में भारतीयों ने विदेशों में 1.1 अरब डॉलर खर्च किए थे। वित्त वर्ष 2024 में यह राशि करीब 29 गुना बढ़कर 31.7 अरब डॉलर पहुंच गई। इस सबसे बड़ी वजह यह है कि बड़ी संख्या में भारतीय विदेश यात्रा पर जा रहे हैं। इस अवधि में रेमिटेंस की 71% बढ़कर 70 अरब डॉलर से 120 अरब डॉलर हो गई है। हालांकि विदेशी रेमिटेंस हासिल करने के मामले में भारत अब भी नंबर 1 बना हुआ है। इस मामले में दूर-दूर तक कोई भारत के आसपास नहीं है। मेक्सिको (66 अरब डॉलर) सबसे ज्यादा विदेशी रेमिटेंस पाने के मामले में दूसरे नंबर पर है।
बैंक ऑफ बड़ौदा के एक अध्ययन के अनुसार पिछले दशक में भारत में आने वाले रेमिटेंस में 5.5% की CAGR की दर से वृद्धि हुई है। इसका ग्लोबल ग्रोथ रेट 4% है। केवल मेक्सिको में यह भारत से ज्यादा 10% रही है। यही वजह है कि फॉरेन रेमिटेंस हासिल करने के मामले में मेक्सिको चीन को पछाड़कर दूसरे नंबर पर पहुंच गया है। बीओबी की इकनॉमिस्ट अदिति गुप्ता ने कहा कि फाइनेंशियल ईयर 2014 में केवल 1.1 अरब डॉलर से वित्त वर्ष 2024 में रेमिटेंस आउटफ्लो बढ़कर 31.7 अरब डॉलर हो गया। यह 40% से अधिक की सीएजीआर से बढ़ा है। उन्होंने कहा कि मिडिल क्लास के उभार से लोगों की इनकम बढ़ी है और विदेशी यात्राओं में ज्यादा खर्च से यह बात साबित होती है।
ग्लोबल ग्रोथ में सुधार
ग्लोबल ग्रोथ में धीरे-धीरे सुधार होने की उम्मीद है। अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोजोन में लेबर मार्केट मजबूत बने हुए हैं जबकि बेरोजगारी दर रिकॉर्ड निचले स्तर पर है। यह रेमिटेंस के लिए अच्छा संकेत है। खाड़ी देशों से रेमिटेंस में कुछ मंदी दिख रही है। स्थिर तेल की कीमतों से इस क्षेत्र से रेमिटेंस को रिवाइव करने में मदद मिलेगी। वैश्विक स्तर पर रेमिटेंस के स्रोतों के संदर्भ में अमेरिका दुनिया में पहले नंबर पर है। साल 2021 में दुनिया में कुल रेमिटेंस में इसकी हिस्सेदारी 25% से अधिक है। इसके बाद खाड़ी देश 17% के साथ दूसरे स्थान पर है। इनके अलावा जर्मनी, यूके और रूस भी ग्लोबल रेमिटेंस फ्लो में अहम कंट्रीब्यूटर्स हैं।
