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सऊदी अरब के साथ लामबंद हुए मुस्लिम देश, अमेरिका को दिखाई ताकत

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नई दिल्ली,

तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक प्लस के तेल उत्पादन में कटौती के फैसले से अमेरिका बिफरा हुआ है. संगठन में दबदबा रखने वाले सऊदी अरब के खिलाफ अमेरिका कई बार तीखे बयान दे चुका है. अभी तक सऊदी अरब अकेले ही इस बारे में सफाई पेश कर रहा था. लेकिन अब यूएई, इराक समेत कई मुस्लिम देशों ने ओपेक प्लस के इस फैसले का सार्वजनिक रूप से बचाव करते हुए सऊदी अरब को मजबूती दी है.

ओपेक प्लस में सऊदी अरब के सहयोगी यूएई ने कहा कि यह फैसला राजनीति से प्रेरित नहीं था. यूएई के ऊर्जा मंत्री सुहेल मोहम्मद ने ट्वीट करते हुए कहा कि, वे साफ करना चाहते हैं कि हाल ही में लिया गया ओपेक प्लस का फैसला पूरी तरह तकनीकी था. उन्होंने आगे कहा कि इस फैसले के पीछे किसी भी तरह की राजनीतिक चाल नहीं है.

इराक ने ओपेक प्लस के फैसले पर क्या कहा?
इराक के स्टेट ऑर्गेनाइजेशन फॉर मार्केटिंग ऑयल की ओर से भी ओपेक प्लस के तेल उत्पादन में कटौती के फैसले को लेकर बयान जारी किया है. बयान में सऊदी अरब के स्टैंड को कायम रखते हुए कहा गया कि यह फैसला पूरी तरह आर्थिक संदर्भ में लिया गया था. बता दें कि अमेरिका के तीखे बयानों के बीच सऊदी अरब ने भी सफाई पेश की थी, जिसमें सऊदी ने इसे पूरी तरह आर्थिक फैसला बताया था.

ओमान, कुवैत ने ओपेक प्लस के फैसले पर क्या कहा?
ओमान के विदेश विभाग ने कहा कि ओपेक प्लस के इस फैसले का वह पूरी तरह समर्थन करता है. ओमान ने कहा कि ओपेक प्लस का यह फैसला पूरी तरह आर्थिक कारकों और सप्लाई व डिमांड पर आधारित था. ओमान के विदेश विभाग की ओर से आगे कहा कि ओपेक प्लस के इस फैसले का लक्ष्य वैश्विक बाजार में स्थिरता कायम करता है. दूसरी ओर, कुवैत ने भी इस फैसले का स्वागत किया है.

वहीं अफ्रीकी देश मोरक्को ने सऊदी अरब की विदेश नीति का समर्थन किया है. मोरक्को के विदेश मंत्री नासेर बोरिता राबत ने कहा कि सऊदी अरब ठीक रास्ते पर आगे बढ़ रहा है. विदेश मंत्री ने आगे कहा कि कूटनीतिक मामला हो या ऊर्जा, सऊदी अरब की विदेश नीति दूरगामी है. विदेश मंत्री ने आगे कहा कि सऊदी अरब के हर फैसले को मोरक्को का पूरी तरह समर्थन है.

अकेला न पड़ जाए, इसलिए प्रेशर बना रहा सऊदी अरब
अमेरिका ओपेक प्लस के तेल कटौती के फैसले से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं है. अमेरिका पिछले काफी समय से यह कोशिश कर रहा था कि सऊदी अरब तेल उत्पादन में कटौती का फैसला न करे. इसी वजह से इसी साल अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने सऊदी अरब का दौरा भी किया था, जहां उनकी मोहम्मद बिन सलमान से ऐसे कई जरूरी मामलों में चर्चा भी हुई थी.

यूक्रेन और रूस के बीच जारी जंग के बीच अमेरिका को पहले से ही डर था कि अगर तेल निर्यातक देशों ने इस तरह की कटौती का फैसला किया तो वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें और ज्यादा बढ़ जाएंगी, जिसका असर अमेरिकी लोगों पर भी होगा.

खासतौर पर ऐसे समय में जब नवंबर में अमेरिका में मिड टर्म चुनाव शुरू होने जा रहे हैं. इसलिए ही अमेरिका पूरी कोशिश में था कि ऐसा न हो, लेकिन सऊदी अरब के दबदबे वाले ओपेक प्लस के फैसले ने उसे बुरी तरह खफा कर दिया. ओपेक प्लस के फैसले के बाद अमेरिका ने नाराजगी जताते हुए सऊदी अरब के खिलाफ तीखे बयान दिए.

अमेरिका ने यहां तक कहा कि अब सऊदी अरब से अपने रिश्तों पर एक बार विचार करने का समय आ गया है. वहीं राष्ट्रपति जो बाइडन ने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि इस फैसले के परिणाम होंगे. अमेरिका ने यह भी आरोप लगाया था कि सऊदी अरब रूस की मदद के लिए ऐसा कर रहा है.

निजी तौर पर दूसरे देशों पर दबाव बना रहा सऊदी अरब
इस मामले पर एक स्कूप भी सामने आया है, जिसमें ऑथर बराक रेविड ने दावा करते हुए कहा है कि सऊदी अरब ने अन्य मुस्लिम देशों के ऊपर निजी तौर पर दबाव देकर ओपेक प्लस के फैसले के समर्थन में बयान जारी करने के लिए कहा है. सऊदी अरब की इसके पीछे मंशा है कि ओपेक प्लस के इस फैसले को लेकर अमेरिकी बयानों के बीच वह अकेला न दिखे. साथ ही अमेरिका को संदेश दिया जा सके कि इस फैसले पर सभी अरब देश एक हैं.

वहीं स्कूप में किसी एक अरब देश के अधिकारी के हवाले से बताया गया कि इस मामले में बयान जारी करने के लिए सऊदी अरब की ओर से काफी ज्यादा दबाव था. वहीं एक पूर्व अमेरिकी अधिकारी ने इस बारे में कहा कि सऊदी अरब दूसरे अरब देशों को एक सुर होने के लिए दबाव डाल रहा है, जिससे यह संदेश जाए कि ओपेक प्लस का तेल उत्पादन में कटौती का फैसला पूरी तरह आर्थिक था, जिसे बाजार की हालात को देखते हुए लिया गया था.

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