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जनादेश योगी आदित्यनाथ का और फैसला नीतीश कुमार का, क्या है कनेक्शन?

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लखनऊ

बिहार में सियासत हर दो साल में 360 डिग्री मतलब गोल-गोल घूम जाती है। इसके केंद्र बिंदु में नीतीश कुमार रहते हैं। ताजा मामले में नीतीश कुमार ने एनडीए के साथ गठबंधन तोड़ लिया है और राजद के समर्थन से आज फिर से मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे हैं। इस निर्णय के पीछे कारण खुद नीतीश कुमार बता चुके हैं लेकिन कहावत है न कि राजनीति में जो दिखता है, वो होता नहीं, और जो होता है वो दिखता नहीं। ऐसे में बिहार के इस सियासी घटनाक्रम पर तमाम खबरें, विश्लेषण, कयासबाजियां बाजार में तैरने लगी हैं। वैसे देश में कोई भी सियासी घटनाक्रम हो और उत्तर प्रदेश का जिक्र न आए ऐसा तो हो ही नहीं सकता। बिहार की कहानी में भी ऐसा ही है। यहां उत्तर प्रदेश किसी अहम किरदार से कम नहीं है। आइए समझते हैं कैसे?

आपने गौर किया ही होगा कि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ ने दो बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और दोनों ही शपथ ग्रहण के कुछ ही महीनों बाद नीतीश कुमार ने बिहार में गठबंधन बदलने का फैसला लिया। पहला मामला 2017 का है, बीजेपी प्रचंड बहुमत के साथ यूपी की सत्ता पर काबिज हुई। योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उधर बिहार में नीतीश की जेडीयू और लालू की राष्ट्रीय जनता दल की गठबंधन सरकार आराम से चल रही थी, अचानक नीतीश ने अंतर्रात्मा की आवाज सुनी और गठबंधन तोड़कर सीधे एनडीए के पाले में जा खड़े हुए।

इस बार 2022 के यूपी चुनाव के बाद भी ऐसा ही हुआ, बस पटकथा पलट गई। यूपी में भाजपा ने पूरी ताकत के साथ सत्ता में वापसी की। नीतीश कुमार योगी की दोबारा ताजपोशी के गवाह भी रहे। सीएम योगी की इस ताजपोशी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद शामिल होने पहुंचे। लखनऊ के इकाना स्टेडियम में हुए भव्य शपथ समारोह में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी शामिल हुए। मंच पर पहुंचते ही सीएम नीतीश ने पीएम मोदी का हाथ जोड़कर अभिवादन किया, वहीं प्रधानमंत्री ने भी खड़े होकर बेहद गर्मजोशी से बिहार के सीएम से हाथ मिलाया। इस दौरान नीतीश का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को झुककर अभिवादन चर्चा के केंद्र में रहा। आरजेडी ने उस समय नीतीश के इस अभिवादन पर मजे भी लिए। लेकिन कुछ ही महीने बाद नीतीश कुमार का हृदय परिवर्तन हुआ और अब नतीजा सबके सामने है। वह बिहार में जेडीयू-आरजेडी गठबंधन सरकार के मुखिया बन चुके हैं।

अब आप कहेंगे योगी के शपथग्रहण से नीतीश का क्या लिंक? ये तो महज इत्तेफाक ही है। जरा रुकिए, क्या सच में ये इत्तेफाक ही है? राजनीतिक विश्लेषक तो ऐसा नहीं मानते। वह तो उत्तर प्रदेश विधानसभा परिणामों को ही नीतीश कुमार की रणनीति बदलने के पीछे अहम कारण मानते हैं। इसके पीछे वह तर्क भी देते हैं। उनका मानना है कि उत्तर प्रदेश हिंदी पट्‌टी में सबसे बड़ा और सियासी तौर पर सबसे ताकतवर राज्य है। यहां के विधानसभा चुनावों का सीधे देश की राजनीति पर असर पड़ता है। 2017 में भाजपा ने एकतरफा जीत हासिल की और अखिलेश को सत्ता से न सिर्फ बाहर किया बल्कि 403 विधानसभा सीटों पर महज 47 सीट पर समेट दिया। यही नहीं बसपा भी रसातल में चली गई। तो ये संदेश गया कि देश की सियासत में छोटी पार्टियों और क्षत्रपों के लिए आगे की राहें बेहद कठिन हैं और भाजपा अश्वमेघ घोड़े पर सवार है। इस संदेश का असर नीतीश कुमार पर भी हुआ। उन्होंने 2017 की जुलाई में लालू की पार्टी से अचानक गठबंधन तोड़ लिया और बीजेपी के साथ सरकार बना ली।

लेकिन 2022 में कहानी बदल गई। इस बार यूपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी दोबारा सत्ता पर काबिज जरूर हुई और योगी दोबारा मुख्यमंत्री भी बन गए लेकिन अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने चुनावों में बीजेपी को कड़ी चुनौती दी। कई सीटों पर जीत हार का निर्णय बेहद कम रहा। अखिलेश यादव ने अकेले दम पर 111 सीटें हासिल की। यही नहीं हाशिए पर जा चुकी राष्ट्रीय लोकदल भी अखिलेश के साथ गठबंधन के दम पर दोबारा उठ खड़ी हुई। इस चुनाव ने ये संदेश दिया कि बीजेपी मजबूत जरूर हो रही है लेकिन क्षेत्रीय पार्टियों के दिन अभी खत्म नहीं हुए हैं। लोग क्षत्रपों में विश्वास बनाए हुए हैं। जाहिर है इस बार नीतीश के लिए संदेश दूसरा था। उन्हें लगा कि रिटायरमेंट से पहले वह एक और बाजी खेल सकते हैं।

दूसरा कारण ये भी था कि बीजेपी के साथ गठबंधन सरकार में नीतीश मुख्यमंत्री जरूर थे लेकिन अब उनकी वो साख नहीं रह गई थी, जो 2014 के दौरान हुआ करती थी। जाहिर है इसी संदेश ने एक बार फिर उनका हृदय परिवर्तन करा दिया। देखना ये होगा कि नीतीश अब आगे क्या करते हैं? क्योंकि इस बार मुख्यमंत्री भले ही नीतीश कुमार हैं लेकिन सियासी लीड तेजस्वी की पार्टी आरजेडी लेती दिख रही है। वही तेजस्वी जिन्होंने पिछले चुनाव में बीजेपी और नीतीश से लोहा लेते हुए आरजेडी को बिहार की सबसे बड़ी पार्टी बना दिया।

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