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Monday, May 4, 2026
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बाप-दादा कांग्रेस के वफादार रहे, नई पीढ़ी BJP पर फिदा… क्‍या इसीलिए यात्रा पर निकले राहुल?

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नई दिल्‍ली

कांग्रेस की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ भारतीय राजनीति में एक ‘टर्निंग पॉइंट’ है। पांच दिन पहले, कांग्रेस के मीडिया प्रभारी जयराम रमेश ने यही ट्वीट किया था। इस यात्रा में, पूर्व अध्‍यक्ष राहुल गांधी और 100 से ज्‍यादा कांग्रेसी 150 दिन पैदल चलेंगे। रात को कंटेनर में आराम करेंगे। बकौल रमेश, ‘यह यात्रा पार्टी को एक नए अवतार में लाएगी। वह पहले से अधिक आक्रामक और सक्रिय होगी, जिसे मित्र और राजनीतिक विरोधी हल्के में नहीं ले सकेंगे।’ पार्टी ने जनता के बीच इस तरह जाने की कोशिश तब शुरू की जब उसके कई झंदाबरदार साथ छोड़ गए हैं। समर्थकों को इसी बात की गनीमत है कि कम से कम कांग्रेस ऐसा कुछ कर तो रही है, नहीं तो संगठन के हर स्‍तर पर पार्टी जनता से दूर थी। शुभचिंतकों को उम्‍मीद है कि यात्रा से चुनाव में भले ही कोई खास फायदा न हो, कांग्रेस को जिंदा रखने में कामयाब हो सकती है।

‘भारत जोड़ो यात्रा’ से गांधी परिवार का जुड़ना अहम
पार्टी में बिखराव के बीच आखिरकार गांधी परिवार को आगे आना ही पड़ा। नए अध्‍यक्ष से लेकर संगठन में अन्‍य पदों पर चुनाव को लेकर अलग खींचतान चल रही है। संगठन के भीतर उन लोगों को हाशिए पर रखा गया जिनके बारे में पता था कि जबतक कांग्रेस पर गांधी परिवार का नियंत्रण है, वे कहीं नहीं जाएंगे। यह मिथक अब टूट रहा है। राहुल का नेतृत्‍व करना कांग्रेसियों के बीच संदेश दे रहा है कि पार्टी का कंट्रोल गांधी परिवार के पास ही रहेगा। राहुल को शुरुआती चार-पांच दिनों में यात्रा का अच्‍छा रेस्‍पांस भी मिला है।

समर्थक कहते हैं कि राहुल भले ही भविष्‍य में कांग्रेस की कमान संभालें न संभालें, कांग्रेस के डी-फैक्‍टो इंचार्ज तो रहेंगे ही। दबी जुबान से कुछ कांग्रेसी यह भी कहते हैं कि अगर गैर-गांधी अध्‍यक्ष भी बना तो वह गांधी परिवार की छाया में ही रहेगा, ‘सीमा’ पार करने की जुर्रत नहीं करेगा। पार्टी के वफादारों की नजर में G-23 के नेता ‘धोखेबाज’ हैं।

कांग्रेस के आगे नई पीढ़ी का भरोसा जीतने की चुनौती
कई चुनाव विश्‍लेषक मानते हैं कि बीजेपी ने 2014 और फिर 2019 में युवा वोटर्स के दम पर सत्‍ता हासिल की। ‘युवा’ नेता की छवि होने का दावा रखने के बावजूद राहुल की स्‍वीकार्यता युवाओं के बीच वैसी नहीं रही, जैसी नरेंद्र मोदी ने बनाई। बीजेपी की सफलता का राज बताते हुए वरिष्‍ठ पत्रकार धर्मेंद्र जोरे लिखते हैं कि भगवा दल ने पीढ़‍ियों से कांग्रेसी रहे परिवारों में सेंध लगाई है। जिनके बाप-दादा कांग्रेस में रहे या उसका समर्थन करते आए, उनको फोकस में रखते हुए बीजेपी ने चुनावी रणनीति तैयार की।

कांग्रेस के कई नेताओं के पोते-बेटे अब बीजेपी में हैं। ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया, कुलदीप बिश्‍नोई, जितिन प्रसाद… के नाम ध्‍यान में आते हैं। इसके उलट, राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ (RSS) या बीजेपी से जुड़े रहे नेताओं की अगली पीढ़ी के कांग्रेसी होने के वाकये कम हैं। कांग्रेस और बीजेपी के बीच जमीन की लड़ाई में कमोबेश यही हो रहा है। बीजेपी के लिए उसका संगठन काफी अहम है जो उसे एक पायदान आगे ले जाता है। कांग्रेस के लिए भी संगठन अहम है लेकिन एक परेशानी के रूप में।

राहुल की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ से कांग्रेसी चुनावों में किसी चमत्‍कार की उम्‍मीद भले ही न कर रहे हों, लेकिन इससे ‘बदलाव’ और ‘सुधार’ का झंडा बुलंद किए नेताओं को यह विश्‍वास जरूर दिलाया जाएगा कि कांग्रेस के लिए गांधी ही ‘चुंबक’ का काम कर सकते हैं। राहुल गांधी इसी ‘चुंबक’ की ताकत परखने यात्रा पर निकले हैं।

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