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आज ही के दिन भारत का हिस्सा बना था हैदराबाद, विलय या एकीकरण को लेकर क्यों बंटी है राय?

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हैदराबाद

आज हैदराबाद के भारतीय संघ में शामिल होने की 75वीं वर्षगांठ हैं। इस मौके पर हैदराबाद में सभी राजनीतिक दल कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। हालांकि भारत का हिस्सा बनने के 74 साल बाद भी इस तथ्य को लेकर राय बंटी हैं कि हैदराबाद का देश में विलय हुआ था या एकीकरण? साथ ही क्या आखिरी निजाम निर्दयी और सामंती शासक थे? दरअसल हैदराबाद रियासत के सातवें और आखिरी निजाम मीर ओस्मान अली खान ने 1922 में एक फरमान जारी करते हुए अपने अधिक्षेत्र में गायों के वध पर प्रतिबंध लगा दिया था। एक साल बाद पंडित मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व वाला अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने गया सत्र में एक प्रस्ताव पारित कर निजाम को इस फैसले लिए धन्यवाद दिया।

इसके एक दशक पहले जब ओस्मान अली खान ने निजाम की गद्दी संभाली थी, उन्होंने मृत्युदंड की सजा की समीक्षा का अधिकार अपने पास रखते हुए मौत की सजा को एक तरह से खत्म कर दिया था। अपने 37 साल के शासन में उन्होंने हर मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया, सिवाय एक मामले के जिसमें एक जूनियर सैन्य अधिकारी ने अपने वरिष्ठ की हत्या की थी। इस तरह के न्यायिक सुधारों को लॉ कमिशन की 35वीं रिपोर्ट में डॉक्यूमेंट किया गया है।

हर चुनावी रैली का हिस्सा बन जाते हैं निजाम
एक शताब्दी बाद निजाम तेलंगाना में होने वाली हर चुनावी रैली का हिस्सा बन गए हैं। तेलंगाना जो हैदराबाद रियासत के तीन क्षेत्रों में एक था। यूं तो राज्य में हर चुनाव से पहले निजाम को फिर से ‘जिंदा’ कर दिया जाता है, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है जब सभी राजनीतिक दलों ने 17 सितंबर को हैदराबाद के भारतीय संघ का हिस्सा बनने की 75वीं वर्षगांठ पर मेगा रैली की योजना बनाई है। संयोग से AIMIM जिस पर अक्सर रजाकार आंदोलन की राजनीतिक निशानी होने का आरोप लगता आया है, उसने निजाम को सामंती शासक घोषित किया है।

जी किशन रेड्डी के नेतृत्व में केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने हैदराबाद के विलय की वर्षगांठ पर एक साल तक जश्न मनाने का फैसला किया है। रेड्डी तेलंगाना की सिकंदराबाद लोकसभा सीट से सांसद भी हैं। तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस), कांग्रेस और एआईएमआईएम पहली बार तिरंगा रैलियों के साथ खुलकर इस जश्न में शामिल हो रहे हैं। हालांकि वह इसे एकीकरण दिवस के रूप में मनाएंगे। जबकि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में जीत के लिए नजर जमाए बैठी बीजेपी इसे मुक्ति दिवस के रूप में मना रही है।

क्या कहते हैं इतिहासकार और निजाम का परिवार?
सियासी गलियारों के बाहर शहर के इतिहासकार और निजाम के परिवार के सदस्यों का तर्क है कि 17 सितंबर 1948 को लेकर जश्न जैसा कुछ भी नहीं है। उनका मानना है कि इस दिन भारत सरकार ने ऑपरेशन पोलो चलाकर रियासत पर बलपूर्वक अधिकार कर लिया था। ‘ऑपरेशन पोलो’ से पहले और बाद की घटनाएं रक्तपात, मौत और विनाश से प्रभावित थीं। कुछ 40,000 मारे गए थे और लाखों विस्थापित हुए थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने पुलिस कार्रवाई के बाद की हिंसा की जांच के लिए पंडित सुंदरलाल कमिटी गठित की थी। कमिटी की रिपोर्ट के अनुसार, एक समुदाय के करीब 24,000 से 40,000 लोग मारे गए थे।

निजाम का बचाव करते हैं उनके वंशज
निजाम और उसके शासन के इर्द-गिर्द रहने वाली तेलंगाना की चुनावी राजनीति के बीच निजाम के वशंज अपने पूर्वज का खुलकर बचाव करते हैं। ओस्मान अली खान के पोते नजफ अली खान याद करते हैं, ‘निजाम कहते थे कि हिंदू और मुसलमान उनकी दो आंखें हैं, मैं एक आंख का पक्ष कैसे ले सकता हूं?’ खान का दावा है कि निजाम को कासिम रिजवी और प्रधानमंत्री लाइक अली ने अपने दबाव में रखा था जिन्होंने 1947 में रातोंरात खूनी तख्तापलट में छतारी के नवाब को गद्दी से उतार दिया था। खान ने यह भी दावा किया कि निजाम के वह फैसले जिसके बाद जिसने पुलिस कार्रवाई हुई वह वास्तव में रिजवी और लाइक अली ने लिए थे।

निजाम के क्रांतिकारी फैसले
अपने शासन के अंतिम दौर में रजाकारों का विरोध झेलने के अलावा निजाम ने जो भी फैसले लिए उन्हें उन दिनों क्रांतिकारी माना जाता था। पुरालेख संबंधी दस्तावेज बताते हैं कि 1922 में गौवध पर प्रतिबंध लगाने से पहले निजाम ने बकरीद में गायों की बलि को बैन किया था। उन्होंने 1938 में हैदराबाद में पहली बार सांप्रदायिक तनाव के बाद पब्लिक सिक्यॉरिटी कमिटी का समर्थन किया था। तब हैदराबाद अग्रणी इंडस्ट्रियल स्टेट हुआ करता था। 1944 में यहां 659 उद्योग थे। निजाम के परपोते हिमायत अली मिर्जा को इस बात का खेद है कि उनके परदादा ने गोवध को बैन किया था, अजंता और एलोरा की पेंटिंग को बहाल किया था और कई मंदिरों को वार्षिक अनुदान भी देते थे। बावजूद इसके उन्हें निशाना बनाया जाता है। वह कहते हैं कि ‘ये राजनेता हैदराबाद का असली इतिहास नहीं जानते हैं।’

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