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लड़खड़ाते कदम, थरथराते होठ, सूनी आंखें… ‘नेताजी’ से छूटा ‘साहेब’ का साथ, आजम खान के भाव में ही पूरी कहानी

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सैफई

लखड़खड़ाते कदम। संभालते अखिलेश यादव और अब्दुल्ला आजम खान। थराथराते होंठ। सूनी आंखें। मुलायम के शव को कांच के बक्शे में रखा गया था। इस बक्शे पर हाथ रखे हुए आजम कुछ वक्त के लिए थम से गए। ऐसे लगा मानो पूछ रहे हों, नेताजी कहां चले गए। अपने साथी को अकेला छोड़कर। आजम खान काफी बीमार चल रहे हैं। दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है। आजम खान ने जब मुलायम के निधन की सूचना पाई तो रह नहीं पाए। चले आए अपने उस साथी से मिलने, जिनके साथ मिलकर राजनीति का अलग कीर्तिमान गढ़ा। एक क्षेत्रीय पार्टी को इतना ताकतवर बना दिया, जिसने बड़ी-बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के नाक में दम कर दिया था।

मुलायम के निधन की सूचना के बाद आजम खान सैफई पहुंचे। व्हील चेयर पर। दो डॉक्टरों की निगरानी में। लेकिन, साबित किया कि आजम और मुलायम को जो लोग गहरे दोस्त कहा करते थे, उसे साबित किया। पिछले मई में जब आजम खान जेल से बाहर आए थे तो संकेतों में मुलायम पर करारा हमला बोला था। नाराजगी तो उनकी वर्ष 2009 में भी बढ़ी थी। समाजवादी पार्टी छोड़ गए थे। तब आजम खान के खिलाफ जाकर नेताजी ने रामपुर से जयाप्रदा को टिकट थमा दिया था। जया प्रदा जीतीं तो यह आजम खान को नागवार गुजरी। हालांकि, सपा से अमर सिंह की विदाई होने के बाद आजम खान वापस समाजवादी पार्टी में लौट आए।

आजम खान ने जेल से निलकने के बाद तकादा किया था, 27 में कोई मिलने नहीं आया। दरसअल, इटावा की लायन सफारी का उससे कुछ दिन मुलायम ने दौरा किया था। सफारी की व्यवस्था में सुधार के निर्देश दिए थे। लेकिन, सीतापुर जेल में न तो मुलायम सिंह यादव और न ही अखिलेश यादव, आजम खान से मिलने पहुंचे थे। नाराजगी थी। ऐसी कि उसके बाद एक बार भी दोनों नेताओं की मुलाकात नहीं हो पाई। अखिलेश यादव तो आजम के पास पहुंचे। दोनों नेताओं की मुलाकात हुई। विधानसभा में भी। लेकिन, मुलायम से मुलाकात न होने की कसक आजम खान के चेहरे पर दिखी।

आजम खान और मुलायम के बीच था अनोखा रिश्ता
आजम खान और मुलायम सिंह यादव के बीच अनोखी दोस्ती का रिश्ता था। आजम ने मुलायम सिंह यादव को हमेशा नेताजी कहकर संबोधित किया। रिश्ते भले ही कितने तल्ख रहे हों। वहीं, मुलायम के लिए आजम खान साहेब थे। मुलायम सिंह यादव उनकी विद्वता की खूब कद्र करते थे। इस कारण दानों में पटती भी खूब थी। तकरार हुई तो आजम ने मुलायम पर खूब हमले किए। लेकिन, नेताजी ने कभी उन्हें पलटकर जवाब नहीं दिया। यही बात मुलायम की निराली थी। इसी ने आजम और मुलायम के रिश्तों को इतने दिनों तक लगभग एकसमान बनाए रखा।

मुलायम सिंह यादव जब भी घिरे, आजम खान उनके निर्णय के पीछे चट्‌टान की तरह खड़े रहे। अलग पार्टी बनाने का मुद्दा आया तो आजम खान पार्टी का संविधान लिखने बैठ गए। वहीं, 2012 में जब अखिलेश यादव को नेतृत्व देने की तैयारी थी, तो पार्टी का एक धड़ा नाराज हो रहा था। आजम ही थे जाे नेताजी के निर्णय के पीछे खड़े हो। इसके बाद विरोध के सुर मंद पड़ गए। बीमारी की स्थिति में जैसे ही अखिलेश पिछले दिनों मिलने पहुंचे, आजम की नाराजगी दूर गई।

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