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Wednesday, April 1, 2026
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मोरबी में मौत और मातम के बावजूद लोग क्यों चाहते हैं पहले जैसा पुल?

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मोरबी

मोरबी में 30 अक्टूबर को ब्रिटिश काल का ‘सस्पेंशन ब्रिज’ टूट कर गिर गया था, जिसमें 135 लोगों की मौत हो गई थी। ‘जुल्टो पुल’ के नाम से चर्चित इस ब्रिज को मोरबी का ताज कहा जाता था। यह मोरबी की सबसे बड़ी पहचान था। हादसे को एक हफ्ते हो चुके हैं। बचाव दल घटनास्थल से जा चुके हैं। पुल के उदास अवशेष लटक रहे हैं। लेकिन शहर के निवासियों का माचू नदी के किनारे पर आना जारी है। हादसे को लेकर प्रशासनिक छानबीन और सियासी आरोप प्रत्यारोपों का दौर जारी है लेकिन मोरबी शहर के लोग इस पुल की भव्यता और खूबसूरती को मिस कर रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह पुल मोरबी के ताज में एक गहना की तरह था। यह शहर की सबसे बड़ी पहचान था। इस पुल के जीर्णोद्धार को लेकर आवाजें बुलंद होने लगी हैं।

यह थी पुल की अहमियत
टाइल डीलर देवेंद्र पटेल भी माचू नदी के किनारे पहुंचने वालों में से एक हैं। वह कहते हैं कि यह पुल हमारे शहर की पहचान था। आज रास्ते से गुजरते हुए जब मुझे जूल्टो पुल नहीं दिखा तो मुझे एक शून्य महसूस हुआ। देवेंद्र कहते हैं कि 1996 में जब टिकट की कीमत 50 पैसे या एक रुपये थी, तब मैं और मेरे साथी नदी के एक तरफ अपनी साइकिलें पार्क करते थे और दूसरी तरफ एक इंजीनियरिंग कॉलेज तक जाने के लिए इस पुल की मदद लेते थे। यह पुल तीन किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी बचाता था। अक्सर, हमें बिना शुल्क के जाने दिया जाता था। अभी भी कुछ दिनों के अंतराल पर मैं पुल पर पहुंच जाया करता था।

मोरबी के लोगों के लिए लोकप्रिय डिस्टिनेशन
स्थानीय होटल व्यवसायी कुलिन ठाकुर कहते हैं कि सस्पेंशन ब्रिज दीवार घड़ियों और सिरेमिक टाइलों के लिए जाने जाने वाले इस शहर की पहचान हुआ करता था। यह ब्रिज बाहरी लोगों के साथ स्थानीय लोगों के लिए भी बड़े आकर्षण का केंद्र था। अगर हम एक सेल्फी चाहते थे, तो यह जगह उसके माकूल थी। अगर हम सैर करना चाहते थे, तो यह पुल एक लोकप्रिय गंतव्य था। छुट्टियों के दौरान हम यहां चले आते थे। यदि कोई रिश्तेदार आता था तो हम उन्हें पुल को दिखाने ले जाते थे।

मोरबी को जोड़ता था यह पुल
इस पुल के आस पास पर्यटन की कई जगहें हैं। पुल के आस पास कई चर्चित मंदिर, एक महल और एक दरगाह, सभी एक किलोमीटर के दायरे में मौजूदा हैं। 233 मीटर लंबे और 1.25 मीटर चौड़े जुल्टो पुल का उद्घाटन 1879 में किया गया था। यह मोरबी-1 और मोरबी-2, शहर के दो हिस्सों को जोड़ता था। मोरबी में स्थित नाट्य कला चैरिटेबल ट्रस्ट के अध्यक्ष दर्पण दवे बताते हैं कि तत्कालीन शासक वाघजी ठाकोर को विदेश यात्राओं का शौक था। उन्होंने अपनी यूरोप यात्रा के बाद इस पुल के निर्माण के लिए सामग्री का आयात किया था।

रोमांच का अनुभव कराने वाला पुल
स्थानीय कैब ड्राइवर रितेश प्रजापति कहते हैं कि इस जगह से मेरी मां की यादें जुड़ी हुई हैं जो मुझे यहां खींच लाती हैं। हम अक्सर नदी में गोता लगाते थे, तब इसका पानी बहुत साफ हुआ करता था। पुल के दूसरी ओर मोरबी-2 में पान की दुकान चलाने वाले गिरीशभाई जोशी कहते हैं कि अधिकांश लोगों को इसे स्विंग कराने में मजा आता था। मुझे याद है, लोगों ने इसे स्विंग कराने के लिए लात मारते थे। पुल पर दो लोग हो तब और भीड़ हो तब लोग लात मारते थे। यही इस पुल पर जाने का रोमांच हुआ करता था।

लोगों को उम्मीद फिर बनाया जाएगा यह पुल
गिरीशभाई जोशी कहते हैं कि मोरबी में यह पुल स्थानीय लोगों के लिए खास था। मुझे उम्मीद है कि एक दिन फिर इसको बनाया जाएगा। स्थानीय निवासी नगमा कहती हैं कि नीचे बहती नदी और उसके किनारे पर पेड़-पौधे, धूल से जूझ रहे शहर के निवासियों के लिए यह घूमने की बेहतरीन जगह थी। मेरे बच्चे अक्सर मुझे पुल पर ले जाने के लिए परेशान करते थे। हम सभी हर बार यहां खुद को प्रकृति के करीब पाते थे।

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