नई दिल्ली
रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर रहे विरल आचार्य ने हाल में देश की बड़ी पांच कंपनियों को तोड़ने का सुझाव दिया था। उनका कहना था कि रिलायंस ग्रुप (Reliance Group), टाटा ग्रुप (Tata Group), आदित्य बिड़ला ग्रुप (Aditya Birla Group), अडानी ग्रुप (Adani Group) और भारती टेलीकॉम (Bharti Airtel) जैसी बिग-5 कंपनियों के कारण देश में महंगाई बढ़ रही है। रिटेल, रिसोर्सेज और टेलीकम्युनिकेशन सेक्टर में इन कंपनियों के पास प्राइस तय करने की बहुत पावर है। कंप्टीशन बढ़ाने और प्राइसिंग पावर को कम करने के लिए बिग 5 कंपनियों को तोड़ दिया जाना चाहिए। लेकिन एसबीआई (SBI) के ग्रुप चीफ इकॉनमिक एडवाइजर सौम्य कांति घोष ने विरल आचार्य की इस राय को खारिज किया है।
सौम्य कांति घोष ने एक रिपोर्ट में कहा कि यह कहना सही नहीं है कि कुछ कंपनियों के हाथ में पावर हैं और इसके कारण देश में महंगाई बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि महामारी के दौर में महंगाई बढ़ने के लिए सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स की दिक्कतें जिम्मेदार हैं। महामारी का प्रकोप खत्म होने के बाद यूक्रेन वॉर के कारण कीमतों में तेजी आई है। कंपनी की हायर प्राइसिंग पावर के कारण कीमत नहीं बढ़ी है। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि कंपनियां कीमतें तय करती हैं और इसके कारण देश में महंगाई ज्यादा है। घोष का कहना है कि खुदरा महंगाई के लिए फूड इनफ्लेशन जिम्मेदार है, कोर इनफ्लेशन नहीं।
कौन हैं विरल आचार्य
आचार्य ने जून 2019 में कार्यकाल पूरा होने से छह महीने पहले ही आरबीआई में अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने पॉलिसी रेट के कई फैसलों में आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास (RBI Governor Shaktikant Das) के खिलाफ वोट दिया था। आचार्य का कहना है कि भारत को मैक्रोइकनॉमिक बैलेंस को बहाल करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि कंपनियों की बढ़ती ताकत से महंगाई के लगातार उच्च स्तर पर बने रहने का जोखिम है। आचार्य का कहना है कि कच्चे माल की कीमत में कमी का फायदा पूरी तरह भारतीय उपभोक्ताओं को नहीं मिलेगा क्योंकि बिग 5 कंपनियां मेटल, कोक, रिफाइंड पेट्रोलियम प्रॉडक्ट्स के मैन्युफैक्चरिंग साथ-साथ रिटेल ट्रेड और टेलिकम्युनिकेशंस को कंट्रोल करती हैं।
