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संविधान का हिस्सा है समान नागरिक संहिता, आंबेडकर भी थे पक्ष में फिर क्यों नहीं हो पाया लागू

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नई दिल्ली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बयान के बाद समान नागरिक संहिता का मुद्दा अचानक गरमा गया है। 2024 लोकसभा चुनाव से पहले निश्चित तौर पर ये बड़ा सियासी मुद्दा बनने जा रहा है। पीएम ने मंगलवार को जिस अंदाज में समान नागरिक संहिता की वकालत की है, उससे संकेत मिलता है कि सरकार संसद के मॉनसून सत्र में इससे जुड़ा बिल भी ला सकती है। हलचल तेज है। गृह मंत्री अमित शाह और कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने मंगलवार को अहम बैठक की। विपक्ष हमलावर है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तो देर रात इमर्जेंसी मीटिंग में रणनीति पर मंथन किया। शादी, तलाक, संपत्ति, उत्तराधिकार जैसे मुद्दों पर अगर सबके लिए एक कानून हो तो आखिर इसमें दिक्कत ही क्या है? लेकिन ये मामला इतना सीधा भी नहीं है। वैसे भी धर्म के जुड़ते ही मामले संवेदनशील हो जाते हैं। समान नागरिक संहिता भारतीय संविधान का अहम हिस्सा है। संविधान की ड्राफ्टिंग कमिटी के चेयरमैन डॉक्टर बीआर आंबेडकर ने संविधान सभा की बैठक में समान नागरिक संहिता के पक्ष में जोरदार दलीलें दी थीं। इसके बावजूद ये लागू नहीं हो पाया। अब इसे लेकर फिर हलचल तेज हुई है।

पीएम मोदी के बयान से तेज हुई सियासी हलचल
इस महीने के दूसरे हफ्ते तक समान नागरिक संहिता का मुद्दा नैपथ्य में दिख रहा था। लेकिन लॉ कमिशन के नए अध्यक्ष जस्टिस (रिटायर्ड) ऋतु राज अवस्थी ने जैसे ही इस मुद्दे पर आम लोगों की सलाह मांगी, इस पर फिर से डिबेट शुरू हो गई। रही सही कसर पीएम मोदी ने मंगलवार को भोपाल में एक कार्यक्रम के दौरान समान नागरिक संहिता की पुरजोर हिमायत करके पूरी कर दी। लॉ कमिशन ने लोगों को अपनी सलाह देने के लिए 30 दिन का वक्त दिया है। संविधान का अनुच्छेद 44 समान नागरिक संहिता की बात करता है। इसमें कहा गया है कि राज्य देश के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने की कोशिश करेगा।

जस्टिस अवस्थी से पहले जस्टिस बीएस चौहान लॉ कमिशन के अध्यक्ष थे। उन्होंने सरकार को भेजी अपनी सिफारिश में कहा था कि अभी समय समान नागरिक संहिता लागू करने के अनुकूल नहीं है। उनकी अगुआई में लॉ पैनल ने अगस्त 2018 में समान नागरिक संहिता पर कंसल्टेशन पेपर जारी किया था। पेपर में बी आर आंबेडकर के संविधान सभा में दिए भाषण का खासतौर पर जिक्र किया गया था। जस्टिस चौहान ने कहा था कि समान नागरिक संहिता बहुत जरूरी है लेकिन इस मुद्दे पर सर्वसम्मति नहीं बनने से इसे लागू करना ठीक नहीं रहेगा।

जस्टिस चौहान की अगुआई वाले लॉ पैनल ने कहा था कि संविधान सभा में समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर इस वजह से सहमति नहीं बन सकी क्योंकि लोगों में कन्फ्यूजन था। कुछ को लगता था कि ये पर्सनल लॉ के समानांतर लागू होगा तो कुछ का मानना था कि ये पर्सनल लॉ की जगह लेगा। इसी वजह से इसे लागू करने के बजाय राज्य को धीरे-धीरे इस दिशा में बढ़ने की बात कही गयी।

डॉक्टर आंबेडकर ने समान नागरिक संहिता को बताया था जरूरी
संविधान सभा की बहस में आंबेडकर के बयान का हवाला देते हुए 2018 के कंसल्टेशन पेपर पर कहा गया, ‘संविधान सभा में बहस के दौरान आंबेडकर की राय ये थी कि समान नागरिक संहिता जरूरी है लेकिन इसे स्वैच्छिक बनाया रखा जाना चाहिए।’ 23 नवंबर 1948 को डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा की बहस में समान नागरिक संहिता के पक्ष में जोरदार दलीलें दी थीं।

1937 से पहले मुस्लिमों पर भी लागू थे हिंदू कानून
संविधान सभा में कुछ सदस्यों खासकर मुस्लिमों के विरोध पर आंबेडकर ने यूसीसी को धीरे-धीरे लागू करने की सलाह दी। तब आंबेडकर ने कहा था कि भविष्य में संसद इस तरह से शुरुआत कर सकती है कि ये संहिता स्वैच्छिक होगी। सिर्फ उन लोगों पर लागू हो जो हलफनामा देकर कहे कि वे इसे मानने के लिए तैयार है। आंबेडकर ने कहा था कि ये कोई नया तरीका नहीं है। 1937 के शरियत ऐक्ट में ये तरीका अपनाया जा चुका है। शरियत ऐक्ट 1937 नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रॉविंस को छोड़कर पूरे भारत में लागू था। कानून में कहा गया था कि ये सिर्फ उन मुसलमानों पर लागू होगा जो शरिया कानून को चाहते थे। इसके लिए उन्हें एक हलफनामा देना होता था कि वे इसे मानने के लिए तैयार हैं। उसके हलफनामा देने के बाद ये कानून उसके और उसके उत्तराधिकारियों पर लागू हो जाता था।

डॉक्टर आंबेडकर ने आगे कहा था, ‘शरियत ऐक्ट 1937 से पहले देश के तमाम हिस्सों में मुस्लिमों पर हिंदू कानून ही लागू होता था। उत्तराधिकार के मामले में यूनाइटेड प्रॉविंस, सेंट्रल प्रॉविंस और बॉम्बे जैसे तमाम हिस्सों में मुस्लिमों पर भी हिंदू कानून लागू होता था। यहां तक कि उत्तराधिकार से जुड़ा मरुमक्कथायम सिस्टम (एक मातृसत्तात्मक सिस्टम) कई दक्षिण भारतीय राज्यों में प्रचलित था जो हिंदुओं के साथ-साथ मुस्लिमों पर भी लागू था।’

सर्वसम्मति नहीं बन पाने से नीति निदेशक तत्व में रखी गई
समान नागरिक संहिता पर संविधान सभा में इसलिए सर्वसम्मति नहीं बन पाई क्योंकि उसके सदस्यों को डर था कि ये पर्सनल लॉ के समानांतर चलेगा। वहीं कुछ लोग सोच रहे थे कि ये पर्सनल लॉ की जगह लेगा। ये आशंका भी जताई गई कि इससे धर्म की स्वतंत्रता बाधित होगी। इसी वजह से संविधान सभा ने समान नागरिक संहिता को लागू करने के बजाय उसे अनुच्छेद 44 में नीति निदेशक तत्वों में डाल दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट भी कई बार समान नागरिक संहिता लागू करने की कर चुका है अपील
सुप्रीम कोर्ट और देश के अलग-अलग हाई कोर्ट ने समय-समय पर कई बार समान नागरिक संहिता लागू करने की जरूरत पर जोर दिया है। चर्चित शाह बानो केस में अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को समान नागरिक संहिता की दिशा में आगे बढ़ने की अपील की थी। 23 अप्रैल 1985 को तत्कालीन सीजेआई वाईवी चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने अपने ऐतिहासिक फैसले में शाह बानो के पति को उन्हें हर महीने 179.20 रुपये भरण-पोषण के लिए देने का आदेश दिया था। हालांकि, बाद में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने संसद में कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया।

 

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