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लाजपत नगर ब्लास्ट 1996 : अब आखिरी सांस तक जेल में सड़ेंगे कल तक ‘मुस्कुरा’ रहे आतंकी भट्ट और हुसैन

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नई दिल्ली

वो दोनों कल तक आजाद घूम रहे थे। निचली अदालत से उन्हें मौत की सजा हुई थी लेकिन हाई कोर्ट ने बरी कर दिया। तब से वर्षों बीत गए। वो बाहर की हवा में सांस ले रहे थे। बेगुनाह इंसानों के लहू से राजधानी दिल्ली की सरजमीं को लाल करने वाले आतंकी मौत के फंदे से तो बचे ही, जेल की चारदीवारी से भी आजाद हो गए। हाई कोर्ट के फैसले के 11 साल बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने उन दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई है। कल तक मुस्कुराने वाले आतंकी अब बाकी जिंदगी जेल में सड़ेंगे। ये आतंकी हैं मोहम्मद अली भट्ट और मिर्जा निसार हुसैन। दोनों ने 27 साल पहले दिल्ली के मशहूर मार्केट लाजपत नगर को धमाके से दहलाया था।

लाजपत नगर आतंकी हमले के मामले में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने इसे भारत को अस्थिर करने की अंतरराष्ट्रीय साजिश करार दिया। सुप्रीम कोर्ट ने जेकेआईएफ के दो आतंकियों मोहम्मद अली भट्ट और मिर्जा निसार हुसैन को बरी करने के हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया। दोनों को आखिरी सांस यानी मरते दम तक जेल में रहने की सजा सुनाई। जावेद अहमद खान की उम्रकैद की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि बिना किसी रियायत के इन सभी दोषियों को ताउम्र जेल में रखा जाए। अगर दोषी जमानत पर बाहर हैं तो वे तत्काल सरेंडर करें। जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संजय करोल की बेंच ने ये भी कहा कि शायद कुछ ‘प्रभावशाली लोगों’ ने ये सुनिश्चित किया कि सिर्फ कुछ आरोपियों को ही मुकदमे का सामना करना पड़े। खास बात ये है कि इस केस में जो ऑरिजिनल चार्जशीट फाइल की गई थी, उसमें 17 आरोपियों के नाम थे लेकिन सिर्फ 8 के खिलाफ हुई मुकदमा चला।

21 मई 1996 को लाजपत नगर में हुए कार बम ब्लास्ट में 13 लोगों की मौत हुई थी। 38 लोग जख्मी हुए। आतंकी हमले की जिम्मेदारी जम्मू-कश्मीर इस्लामिक फ्रंट (JKIF) ने ली। 14 साल बाद 22 अप्रैल 2010 को दिल्ली की एक अदालत ने इस मामले में 6 आतंकियों को दोषी ठहराया। मोहम्मद नौशाद, मोहम्मद अली भट्ट और मिर्जा निसार हुसैन को फांसी की सजा हुई। जावेद अहमद खान को उम्रकैद की सजा हुई। 2 अन्य आरोपियों को आतंकी हमले में उनकी मामूली भूमिका की वजह से रिहा कर दिया गया क्योंकि मुकदमे के दौरान ही वो इतने समय तक जेल में रह चुके थे, जितनी उनको सजा भी नहीं होती।

मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा। हाई कोर्ट ने मौत की सजा पाए भट्ट और हुसैन को बरी कर दिया। निचली अदालत से फांसी की सजा पाए एक अन्य आतंकी नौशाद की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया। जावेद अहमद खान को हुई उम्रकैद की सजा को हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में पुलिस जांच पर सवाल उठाते हुए कहा था, ‘पुलिस ने जांच का न्यूनतम मानक भी पूरा नहीं किया।’ लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भट्ट और हुसैन को बरी करने के हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया। उन्हें आखिरी सांस तक जेल में रहने की सजा सुनाई। शीर्ष अदालत ने कहा कि ये मामला दुर्लभतम मामलों की श्रेणी में आता है, लेकिन कुल मिलाकर 27 साल और ट्रायल कोर्ट में 14 साल की देरी को देखते हुए दोषियों को मौत की सजा नहीं दी गई। बेंच ने कहा, ‘राजधानी शहर के बीचोबीच एक प्रमुख बाजार पर हमला किया गया…बड़ी निराशा के साथ हम ये देखने के लिए मजबूर हैं कि शायद प्रभावशाली व्यक्तियों की संलिप्तता के कारण कई आरोपी व्यक्तियों में से केवल कुछ पर ही मुकदमा चलाया गया है, जो तथ्य से स्पष्ट है।’

मोहम्मद अली भट्ट और मिर्जा निसार हुसैन को उनके एक अन्य साथी लतीफ अहमद वजा के साथ नेपाल से पकड़ा गया था। दिल्ली पुलिस ने 1996 में नेपाल में इन्हें गिरफ्तार किया था। उनके खिलाफ लाजपत नगर ब्लास्ट का केस चला। पूछताछ में पता चला कि इन आतंकियों का कुछ और हमलों में हाथ था। बाद में इन्हें राजस्थान पुलिस ने समलेटी ब्लास्ट मामले में गिरफ्तार किया। 22 मई 1996 को राजस्थान स्टेट ट्रांसपोर्ट कॉर्पोरेशन की बस में धमका हुआ था। चौसा जिले के समलेटी गांव में हुए इस धमाके में 14 लोगों की मौत हुई थी और 37 घायल हुए थे। लापजपत नगर ब्लास्ट केस में दिल्ली हाई कोर्ट ने 2012 में भट्ट और हुसैन को बरी कर दिया। संयोग से 7 साल बाद जुलाई 2019 में दोनों समलेटी बस ब्लास्ट मामले में भी बरी हो गए। राजस्थान हाई कोर्ट नेजिन आरोपियों को बरी किया उनमें भट और हुसैन भी शामिल थे। तब जेल से रिहा होने के बाद भट्ट का कश्मीर में अपने माता-पिता की कब्र पर रोते हुए वीडियो काफी वायरल हुआ था।

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