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विकास दुबे, श्रीकांत त्यागी या प्रवेश शुक्ला, इन आतताइयों को बचाने जाति की दीवार कौन खड़ी करता है?

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नई दिल्ली

हम बचपन से सुनते हैं कि अपराधियों का कोई धर्म, मजहब या जाति नहीं होती है। वे सिर्फ अपराधी होते हैं तो फिर गलत काम करने पर कुछ लोग जाति या धर्म वाला विक्टिम कार्ड क्यों खेलने लग जाते हैं? ताजा मामला एमपी के सीधी पेशाब कांड का है। पहले तो बुलडोजर चलने पर सवाल उठे और जब प्रशासन ने एक्शन लिया तो प्रवेश शुक्ला के माता-पिता के समर्थन में धार्मिक कार्ड खेला जा रहा है। अखिल भारतीय ब्राह्मण समाज नाम के संगठन ने आदिवासी पर पेशाब करने वाले आरोपी के परिवार का सपोर्ट करने का ऐलान किया है। इस संगठन का कहना है कि हम आरोपी के निर्दोष माता-पिता का समर्थन करते हैं और उनके साथ खड़े हैं। इस कांड में भले ही माता-पिता पूरी तरह से निर्दोष हों, पर इस तरह आरोपी को सिंगल किया जाएगा तब तो किसी को सजा ही नहीं मिल सकेगी। जो भी अपराधी या गुनहगार होगा उसका परिवार, पत्नी, बच्चे होंगे और वे उसके सजा पाने से जरूर प्रभावित होंगे। रासुका लगने के बाद आरोपी शुक्ला को गिरफ्तार किया गया और घर का अवैध हिस्सा ढहा दिया गया। तस्वीरें आईं जिसमें परिवार बाहर चूल्हा-सिलेंडर लिए जमीन पर दिखा।

परिवार के साथ सबकी हमदर्दी है लेकिन आपके परिवार का सदस्य गलत काम में लिप्त पाया जाता है तो आप उसके असर से कैसे बच पाएंगे। पूरा न सही कुछ प्रतिशत झटका तो पूरे परिवार को लगेगा। वैसे भी, प्रशासन ने अवैध ढांचा गिराया है। ब्राह्मण vs आदिवासी के तौर पर ली जा रही इस घटना में जातिवाद का ऐंगल निकाला जाना बिल्कुल घृणित काम है। ब्राह्मण संगठन के एमपी यूनिट के अध्यक्ष पुष्पेंद्र मिश्र ने एक लाइन बहुत महत्वपूर्ण कही है, ‘क्या यह विधि सम्मत है कि करे कोई और भरे कोई?’ अब पुष्पेंद्र जी से यह पूछा जाना चाहिए कि तब तो यही सवाल अतीक अहमद या दूसरे अपराधियों के परिवार भी उठा सकते हैं। यूपी में अतीक कांड से पहले प्रयागराज के नैनी में एक शूटर को मारा गया था तो उसकी पत्नी के रोने का वीडियो देख लोगों की आंखें नम हो गईं तो क्या किसी ने यह कहा कि प्रशासन ने गलत किया? क्या गुनहगार को सजा उसके परिवार की स्थिति देखकर दी जाएगी? अगर ऐसा है तो फिर प्रवेश शुक्ला को ही क्यों हर अपराधी के एनकाउंटर से पहले पुलिस यह पूछे कि तुम्हारे मरने के बाद मां-बाप का क्या होगा? बच्चों के लिए तुमने बीमा लिया है या नहीं क्योंकि मरने के बाद उनकी देखरेख करने वाला कोई नहीं होगा।

सवाल शुक्ला परिवार के सपोर्ट का भी नहीं है। यह तो व्यक्ति की स्वेच्छा का मामला है लेकिन अगर ब्राह्मण के अपराध करने पर ब्राह्णण संगठन, यादव के सपोर्ट में सिर्फ यादव, दलितों के सपोर्ट में सिर्फ दलित खड़े होंगे तब तो हमने अपराधी की जाति निकाल ली न। ब्राह्मण संगठन ने 51,000 रुपये की सहायता दी है। अच्छा होता कि 25000 रुपये उस आदिवासी पीड़ित को भी ब्राह्मण समाज देता और यह कहता कि हम आपके साथ हैं। संगठन की एक लाइन और खाई को बढ़ाने का काम करती है, जिसमें लिखा गया है, ‘ज्यादा से ज्यादा स्वजातीय बंधु पीड़ित परिवार की सहायता करें।’ वैसे इसके लिए सिर्फ ब्राह्मण संगठन ही दोषी नहीं है। यह हमारी सियासत की देन है कि जातिवाद खत्म करने का ढोल पीटने वाले नेताओं के चलते ही तमाम जातीय संगठन खड़े हो गए हैं। कोई अपराधी और पीड़ित की बात क्यों नहीं करता।

बल्कि परिवार पर असर देखकर ही तो अपराधी भी सुधर जाते हैं। कश्मीर में कुछ केस भी सामने आए हैं जब आतंकवाद की राह पकड़ चुके युवा मां-बाप की अपील पर हथियार डालने को राजी हो गए। उनकी आंखों से आंसू बह निकले। आज के समय में प्रवेश शुक्ला को दुख इस बात का नहीं होगा कि उसने गलत काम किया जिसकी उसे सजा मिली बल्कि यह ज्यादा होगा कि उसने ऐसा काम किया जिसकी सजा उसके पूरे परिवार को भुगतनी पड़ रही है।

यही हुआ था जब विकास दुबे का मामला सामने आया था। सवाल सिर्फ दुबे, शुक्ला का नहीं है। हर जातीय संगठन में जातीयता क्यों ढूंढी जा रही है? विकास दुबे के केस में भी ब्राह्मण कार्ड जमकर खेला गया था। यहां तक कह दिया गया कि यूपी में फूलन देवी की प्रतिमा लग सकती है तो विकास दुबे की क्यों नहीं? दो साल पहले ब्राह्मण महासभा ने यह मांग उठाई थी। क्या गलत काम करने वाले को हम आदर्श मानते है? मूर्ति तो उसकी लगाई जाती है जिसको देखकर बच्चे उसके जैसा बनने की सोचें। क्या ब्राह्मण समाज अपने बच्चों को गुंडा बनाना चाहेगा। कानपुर में 8 पुलिसवालों की हत्या कर फरार गुंडे को कोई आदर्श कैसे मान सकता है। सिर्फ नफरती सोच की चाशनी में खुद को डालकर कड़वी जलेबी कोई क्यों बनाना चाहता है। मीठी जलेबी में क्या दिक्कत है। समाज में जाति-धर्म अपने काम के लिए रहे लेकिन जब कोई मछली तालाब को गंदा करने की सोचे तो फौरन उसे बाहर कर देना चाहिए। जाति, अपराध और राजनीति का कॉकटेल सियासत ने तैयार किया है। कुछ ब्राह्मण नेताओं को इसमें कुछ गलत नहीं लगता। बात यहां तक पहुंची कि विकास दुबे को ‘ब्राह्मणों का रॉबिनहुड’ कहा जाने लगा था।

श्रीकांत त्यागी को भी आप जानते ही होंगे। महिला से बदसलूकी का आरोपी जेल गया तो उसके समाज वाले सपोर्ट में खड़े हो गए। ऐसे में पार्टियां भी फूंक-फूंककर कदम रखती है। वोट का ऐंगल उन्हें दिखाई देने लगता है। उसके घर पर बुलडोजर चला तो उसकी जाति वाले गुस्सा गए। क्या उस महिला की जगह आपके समाज की महिला होती तो भी श्रीकांत जैसे लोगों का सपोर्ट करते? जातिवाद का जहर जिस तरह से हमारी रगों में दौड़ने लगा है, उसने हमारी सही-गलत सोचने की तार्किकता पर ग्रहण लगा दिया है। यहां बात भले ही जिक्र ब्राह्मण का हुआ है लेकिन यह हर जाति में है। राजस्थान में गैंगस्टर आनंदपाल सिंह के एनकाउंटर के बाद कुछ भी राजपूत समाज के कुछ लोग उसके सपोर्ट में बोलने लगे थे।

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