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हथियारों के लिए इतनी जल्दी नहीं छोड़ सकते रूस का साथ, भारत-अमेरिका की डिफेंस डील ही काफी नहीं

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वॉशिंगटन

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अरबों डॉलर की डिफेंस डील अमेरिका के साथ की है। डिफेंस डील को लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं कि भारत रूस के हथियारों पर अपनी निर्भरता को कम करने के लिए ऐसा कर रहा है। हालांकि डिफेंस एनालिस्ट मानते हैं कि इन हथियारों की खरीद का मुख्य उद्देश्य रूस से दूर जाना नहीं, बल्कि घरेलू हथियारों के उद्योग को बढ़ावा देना है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक है। लेकिन भारत अब चाहे किसी भी देश से डील करे वह अपने सभी बड़े डिफेंस सौदों में संयुक्त निर्माण और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का प्रावधान शामिल कर रहा है।

यह दृष्टिकोण दिखाता है कि भारत अपने आयात में विविधता लाना चाहता है। इसके साथ ही यह भारत की लंबे समय से सैन्य हार्डवेयर को घरेलू स्तर पर विकसित करने की इच्छा को दर्शाता है। यूक्रेन युद्ध में रूसी हथियारों की कई बार विफलता और सैन्य आपूर्ति में व्यवधान के कारण इसकी संभावना तेज हुई है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक पिछले दो दशकों में भारत ने हथियारों की खरीद पर 60 अरब डॉलर से अधिक का खर्च किया है।

रूस पर निर्भरता कम कर रहा भारत
इनमें से लगभग 39 अरब डॉलर रूस से खरीद के कारण है। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने अगले दशक में घरेलू हथियार उद्योग से 100 अरब डॉलर से ज्यादा के मूल्य के हथियार ऑर्डर करने की मंशा की घोषणा की है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय सेना के एक अधिकारी ने कहा, ‘यह वास्तविकता है कि हमें रूस पर अपनी निर्भरता को घटाना पड़ेगा। लेकिन यह दूसरा पक्ष है। हमें पहले आयात से बाहर निकलने का प्रयास करना है।’ पिछले महीने पीएम मोदी की अमेरिका की राजकीय यात्रा के दौरान भारत ने 3 अरब डॉलर की डिफेंस डील की है।

रूस से दूर होने में लगेगा समय
भारत ने अमेरिका से फाइटर जेट के इंजन और ड्रोन से जुड़ी डील की है। रक्षा में आत्मनिर्भर बनने के अपने सपने को पूरा करने के लिए भारत ने इस जेट इंजन में जॉइंट मैन्युफैक्चरिंग के प्रावधान को भी शामिल किया है। भारत में अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी ने कहा कि अमेरिका भारत की सैन्य टेक्नोलॉजी में पहुंच को आसान बना रहा है। उन्होंने कहा कि अमेरिका अपने कुछ निकटतम सहयोगियों से ज्यादा टेक्नोलॉजी भारत को दे रहा है। स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के एक भारतीय सुरक्षा विशेषज्ञ अर्जान तारापोर ने कहा कि रूस से दूर होना भारत के लिए कई दशक का सफर है।

चीन से लेना है टक्कर
तारापोर का कहना है कि ज्यादातर पारंपरिक हथियारों में भारत रूसी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करता है। अमेरिका और भारत के सहयोग को ऐसी नई टेक्नोलॉजी की ओर जाना चाहिए जो अभी भारत के पास नहीं हैं। भारत का मुख्य उद्देश्य एडवांस हथियारों से लैस चीन के साथ अपने तकनीकी अंतर को कम करना है। यूक्रेन युद्ध ने दिखा दिया है कि रूस हथियारों की समय पर डिलीवरी नहीं कर पाता है। रूस से सुखोई के पार्ट्स और एस-400 के आने में देरी की बात पहले ही सामने आ चुकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसीलिए भारत को किसी दूसरे देश या सिर्फ एक देश पर निर्भर होने की जगह आत्मनिर्भर बनना चाहिए।

 

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