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Tuesday, April 28, 2026
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मोबाइल ने ये किस खेल में फंसा दिया है आपके बच्‍चों को, छटपटा के मरने को हो रहे हैं मजबूर

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नई दिल्‍ली

राजस्‍थान के अलवर में एक बच्‍चे का वीडियो सामने आया है। केस स्‍टटी का यह वीडियो रोंगटे खड़े कर देता है। इसमें बच्‍चे को ऑनलाइन गेम खेलने के लिए छटपटाते हुए देखा जा सकता है। यह बच्‍चा ऑनलाइन गेम खेलने का लती हो चुका था। इस वीडियो को देखकर किसी का भी कलेजा मुंह में आ जाएगा। आपको पता लग जाएगा कि ऑनलाइन गेम की लत चिलम फूंकने से भी खराब है। यह एहसास दिलाएगा कि आने वाली पौध किस हद तक कमजोर है। हालांकि, बच्‍चों को इसके लिए पूरी तरह कसूरवार नहीं ठहरा सकते हैं। हमने बच्‍चों के सामने एक महामायावी दुनिया बना दी है। पबजी और फायरफ्री जैसे गेम इस महामायावी दुनिया में उतरने का रास्‍ता बना देता है। बच्‍चों का क्रिएटिव माइंड इस वर्चुअल दुनिया को आसानी से एसिमिलेट कर लेता है। दूसरे शब्‍दों में कहें तो वही दुनिया उसे अपनी लगने लगती है। यह नशा हैल्‍यूसिनेशन की तरह होता है। ठीक वैसा ही जैसा कोई भंगेड़ी अनुभव करता है। उसे लगने लगता है कि वह उड़ रहा है। यह आसमान उसके पैरों के नीचे चला आया है। इन्‍हें मौत का कोई भय नहीं होता है। खेलते-खेलते वह मौत की आगोश में चले जाते हैं।

पबजी और फायरफ्री जैसे ऑनलाइन गेम की लत लग जाना बड़ी बात नहीं है। ये गेम खेलने वाले इसमें डूब जाते हैं। इतना कि उन्‍हें असल दुनिया असल नहीं लगती है। अलबत्‍ता, इन गेम्‍स में बनाई गई फील्‍ड अपनी लगने लगती हैं। ये गेम्‍स समय के साथ इतने ज्‍यादा परिष्‍कृत हो गए हैं कि ये रियलिटी का आभास कराने में समर्थ हो रहे हैं। बच्‍चों का कोमल मन और मस्तिष्‍क इन गेम्‍स को अपनाने के लिए खाद का काम करता है। जल्‍द ही बच्‍चे इन गेम्‍स में खो जाते हैं। वे इन गेमों में जीत को जीत और हार को हार समझने लगते हैं। यही उनकी दुनिया होती है।

ब‍िगाड़ देता है मानस‍िक संतुलन
कई बच्‍चे गेम में हार को बर्दाश्‍त नहीं कर पाते हैं। फिर या तो वे सुसाइड की तरफ कदम बढ़ाते हैं या उनका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। जब इनसे यह वचुर्अल दुनिया दूर ले जाई जाती है तो ये छटपटाते हैं। रोते हैं। गिड़गिड़ाते हैं। ऑनलाइन गेम्‍स के लिए तड़पते और छटपटाते ये बच्‍चे किसी और लोक से नहीं उतरे हैं। ये हमारे ही घरों में रहते हैं। हालांकि, इस घर में उनका दोस्‍त कोई भाई-बहन, माता-पिता, चाचा-चाची, ताई-ताऊ या आसपड़ोसी नहीं होते हैं। एकल परिवार जहां अक्‍सर एक बच्‍चा होता है और माता-पिता कमाने की अंधी दौड़ में लगे होते हैं वहां मोबाइल ही बच्‍चों का सबसे सगा दोस्‍त बन जाता है।

परवर‍िश करना ही नहीं चाहते हैं
अपनी सुविधा के लिए बच्‍चों के हाथों में मोबाइल हम खुद पकड़ा देते हैं। उन्‍हें दुनिया से काटने के लिए हम खुद एक झूठी मायावी दुनिया उनको परोस देते हैं। हम यह समझकर खुश होने लगते हैं कि बच्‍चा घर में है तो क्‍या ही कुछ गड़बड़ होगी। ऐसा भी हम सिर्फ इसलिए करते हैं ताकि चैन से अपना काम कर सकें। सच तो यह है कि हम बच्‍चे सिर्फ समाज को दिखाने के लिए पैदा कर रहे हैं। उनकी परवरिश हम करना ही नहीं चाहते हैं। परवरिश बहुत व्‍यापक शब्‍द है। परवरिश के नाम पर हम सिर्फ साधनों का अंबार खड़ा कर रहे हैं। कभी कुछ तो कभी कुछ लाकर हम उन्‍हें खुश करने की कोशिश करते हैं। हमारा एजेंडा बच्‍चों को खुश करना नहीं, बल्कि अपने आप को खुश करना होता है। जब हम बच्‍चों को समय देंगे। उनके साथ आत्‍मीय कनेक्‍शन बनाएंगे। उन्‍हें दूसरों से कनेक्‍ट होने में फेसिलिटेट करेंगे। अपनी मिट्टी की सुगंध लेने देंगे। सुपरपैरेंटिंग से बचेंगे तो यही बच्‍चे फूल की तरह खिलखिलाएंगे। फलदार वृक्ष बनेंगे।

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