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बदल गया है चीन… ड्रैगन की धरती से बोरिया-बिस्तर समेटने की तैयारी में क्यों हैं कई देश

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नई दिल्ली

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी इकॉनमी वाले देश चीन के लिए दिन-ब-दिन हालात मुश्किल होते जा रहे हैं। एक के बाद एक दुनियाभर के देश उससे मुंह मोड़ रहे हैं। अमेरिका और चीन के बीच पहले से ही तनाव की स्थिति है। दोनों देश एकदूसरे की टेक कंपनियों पर बंदिशे लगा रहे हैं। साथ ही दुनिया के कई देश चीन के कर्ज के जाल में फंसे हुए हैं। चीन की इकॉनमी अभी पूरी तरह कोरोना महामारी के असर से नहीं निकल पाई है। अब यूरोप की सबसे बड़ी इकॉनमी जर्मनी ने चीन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए एक व्यापक रणनीति बनाई है। इसमें कई क्रिटिकल सेक्टर शामिल हैं। इसके तहत मेडिसिन, इलेक्ट्रिक कारों में यूज होने वाली लीथियम बैटरीज और चिप बनाने में काम आने वाले जरूरी सामान के मामले में चीन पर निर्भरता कम की जाएगी। जर्मनी की सरकार ने इस बारे में बाकायदा 40 पन्नों की एक स्ट्रैटजी पब्लिश की है। मानवाधिकार रेकॉर्ड और इंटरनेशनल कानूनों के प्रति रवैये को लेकर चीन की दुनियाभर में आलोचना हो रही है। ऐसी स्थिति में पश्चिमी देशों के लिए चीन पर अपनी निर्भरता कम करना मजबूरी बन गया है।

चीन जर्मनी का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2022 में 335 अरब डॉलर रहा। लेकिन अब स्थितियां बदल गई हैं। जर्मनी की सरकार ने अपने डॉक्यूमेंट में कहा है कि चीन बदल गया है। इन कारणों से हमें भी चीन के प्रति अपने अप्रोच में बदलाव लाने की जरूरत है। इसके मुताबिक चीन क्लाइमेंट चेंज, महामारी और सस्टेनेबल डेवलपमेंट में जर्मनी का अहम साझेदार है लेकिन उसे अपने हितों की ज्यादा चिंता है और वह अंतरराष्ट्रीय कानूनों को भी ठेंगा दिखा रहा है। जर्मनी चीन के साथ ट्रेड और निवेश जारी रखना चाहता है लेकिन क्रिटिकल सेक्टर में अपनी सप्लाई चेन को डाइवर्सिफाई करना चाहता है।

चीन में जर्मन कंपनियों का बिजनस
डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि चीन मेडिकल टेक्नोलॉजी और दवाओं के मामले में चीन पर हद से ज्यादा निर्भर है। साथ ही आईटी, सेमीकंडक्टर बनाने के लिए जरूरी साजोसामान, मेटल्स और रेयर अर्थ्स के मामले में भी जर्मनी पूरी तरह चीन पर निर्भर है। इसमें कहा गया है कि क्रिटिकल सेक्टर्स में यूरोपीय यूनियन को ऐसे गैर ईयू देशों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए जो हमारे फंडामेंटल वैल्यूज की परवाह नहीं करते हैं। इसके मुताबिक सरकार चीन के साथ रिसर्च और डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के लिए भी सख्त प्रावधान किया जाएगा।

जर्मनी की कई कंपनियों के लिए चीन बड़ा बाजार है। इनमें Volkswagen (VLKAF) और BMW भी शामिल है। सरकार का कहना है कि वह इन कंपनियों के साथ बात करेगी। चीन में कारोबार कर रही कंपनियों ने इस रणनीति का स्वागत किया है लेकिन कुछ चिंता भी जताई है। सीएनएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक German Chamber of Commerce के नॉर्थ चाइना ब्रांच के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर Jens Hildebrandt ने कहा कि चीन में बिजनस कर रही जर्मनी की अधिकांश कंपनियों ने जोखिम को कम करने के लिए उपाय कर लिए हैं। हालांकि उन्होंने कहा कि पेपर में इस बात का जिक्र नहीं है कि चीन पर निर्भरता कम किए बगैर हम कैसे अपनी इकॉनमी को मजबूत कर सकते हैं।

चीन का कानून
चीन ने हाल में नया जासूसी विरोधी कानून (Anti-Espionage Law) लागू किया है। इससे विदेशी कंपनियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। चीन की सरकार का कहना है कि इस कानून का मकसद देश की नेशनल सिक्योरिटी को मजबूत करना है। इस बारे में मूल कानून 2014 में आयाा था। नए कानून के मुताबिक सभी तरह के जासूसी की आशंका के जुड़े किसी भी डॉक्यूमेंट्स, डेटा, मटीरियल्स और आर्टिकल्स की जांच हो सकती है। साथ ही इसके जरिए सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारियों को किसी भी संदिग्ध के सामान, इलेक्ट्रॉनिक डेवाइसेज और प्रॉपर्टी की जांच करने का अधिकार होगा। विदेशी कंपनियों ने इस पर खासी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि जल्दबाजी में बनाए गए इस कानून से बिजनस का माहौल खराब होगा। अमेरिका और चीन के बीच चल रहे तनाव के कारण यह पहले ही मुश्किल में है।

Nikkei Asia के मुताबिक चीन में विदेशी कंपनियों के दो सबसे बड़े संगठनों के नेताओं ने कहा कि यह कानून जल्दबाजी में बनाया गया है। इससे विदेशी कंपनियों का चीन पर भरोसा और डगमगा जाएगा। अमेरिका और चीन के बीच बढ़ रहे तनाव से पहले ही कंपनियों को मुश्किलें बढ़ी हुई हैं। यूरोपियन यूनियन चैंबर ऑफ कॉमर्स के प्रेसिडेंट Jens Eskelund ने कहा कि हमें और किस चीज का पालन करना है। स्टेट सीक्रेट क्या होता है। हमारे पास क्या जानकारी नहीं होनी चाहिए? इस कानून से कंपनियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। पहले ही उन्हें डेटा सिक्योरिटी लॉ और नेशनल सिक्योरिटी लॉ जैसे कानूनों का सामना करना पड़ रहा है।

चीन की इकॉनमी
अमेरिकन चैंबर ऑफ कॉमर्स इन इंडिया के प्रेजिडेंट माइकल हार्ट ने कहा कि अमेरिका की कंपनियां कानूनों का पालन करना चाहती हैं। लेकिन सामान्य बिजनस एक्टिवटी भी कानून के दायरे में आएगी तो इससे मुश्किल होगी। इंटरनेशनल लॉ फर्म Morgan Lewis ने मई में अपनी रिपोर्ट में कहा था कि संदिग्धों की पहचान करने की शर्तें स्पष्ट नहीं है। इससे कंपनियों के लिए अनिश्चितता की स्थिति बनेगी। चीन की इकॉनमी कोविड महामारी के असर से बाहर आने की कोशिश में लगी है। सरकार ने बिजनस एक्टिविटी को बढ़ाने के लिए ब्याज दरों में कटौती की है। सरकार उम्मीद कर रही है कि इससे खपत बढ़ेगी। साल के पहले पांच महीनों में रियल एस्टेट की सेल्स में गिरावट आई है। जून में चीन के एक्सपोर्ट में तेज गिरावट आई। यह कोरोना महामारी शुरू होने के बाद सबसे बड़ी गिरावट है। इस दौरान आयात में 6.8 फीसदी गिरावट आई।

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