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कैसे चलेगी भारत की इलेक्ट्रिक गाड़ी? चीन और हॉन्ग कॉन्ग से आ रहा 96% लीथियम

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नई दिल्ली

सरकार ने हाल में 30 क्रिटिकल मिनरल्स की एक लिस्ट बनाई है। इसमें ऐसे मेटल्स को शामिल किया गया है जो देश की इकनॉमिक ग्रोथ और नेशनल सिक्योरिटी के लिए अहम हैं। इनमें लीथियम भी शामिल है जिसे नए जमाने को गोल्ड कहा जाता है। इसका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वीकल्स की बैटरी, मोबाइल फोन, लैपटॉप, हाइड्रोजन फ्यूल स्टोरेज, एयर कंडीशनिंग सिस्टम्स और फार्मास्यूटिकल्स में होता है। देश में कई इंडस्ट्रीज इस एक मेटल पर निर्भर हैं लेकिन भारत में अब तक इसका एक किलो भी उत्पादन नहीं होता है। हाल में जम्मू एवं कश्मीर ने 59 लाख टन लीथियम का भंडार मिला है लेकिन इससे उत्पादन शुरू होने में अभी समय लगेगा। अभी भारत चीन और हॉन्ग कॉन्ग से लीथियम आयन का आयात करता है जिसका इस्तेमाल बैटरी में होता है।

2020-21 में भारत के लीथियम आयात में चीन की हिस्सेदारी 73 परसेंट थी। अगर हॉन्ग कॉन्ग को भी मिला दिया जाए तो यह 96 परसेंट बैठती है। लीथियम के अलावा कोबाल्ट, निकल, वैनेडियम, नियोबियम, जरमैनियम, रेनियम, टैंटालम और स्ट्रोनियम जैसे क्रिटिकल मिनरल्स के लिए भी भारत पूरी तरह आयात पर निर्भर है। साथ ही कॉपर, गैलियम, ग्रेफाइट, फॉस्फोरस, पोटाश, टिन, टाइटैनियम और टंगस्टन जैसे मेटल्स भी भारत इम्पोर्ट करता है। इनका इकनॉमिक अहमियत बहुत ज्यादा है लेकिन इनके साथ सप्लाई का रिस्क भी जुड़ा है। निजी कंपनियों ने सरकार की पहल का स्वागत किया है लेकिन उनका कहना है कि इसके लिए एक स्पष्ट नीति की जरूरत है।

क्या चाहती है इंडस्ट्री
इनमें से कुछ मेटल्स की डिमांड में भारी तेजी आने की उम्मीद है लेकिन सप्लाई चेन में मामूली बाधा बहुत भारी पड़ सकती है। इससे हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स, टेलिकम्युनिकेशंस, ट्रांसपोर्ट और डिफेंस इंडस्ट्रीज प्रभावित हो सकती है। इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक लीथियम की डिमांड में 2020 से 2040 के बीच 42 गुना और कोबाल्ट की डिमांड में 25 गुना तेजी आने की उम्मीद है। इलेक्ट्रिक टू वीलर बनाने वाली कंपनी एथर एनर्जी के सीईओ तरुण मेहता ने कहा कि सरकार ने सप्लाई चेन में रिस्क कम करने के लिए पहला कदम उठाया है। मेटल्स की माइनिंग और रिफाइनिंग के लिए इंडस्ट्रीज को इन्सेंटिव देना चाहिए।

दुनिया में कोबाल्ट, कॉपर, ग्रेफाइट, लीथियम, मैगनीज, निकल और रेयर अर्थ एलिमेंट का कम से कम 55 परसेंट भंडार 15 देशों के पास है। इनमें ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, चिली, चीन, कॉन्गो, गैबन, इंडोनेशिया, मेडागास्कर, मोजाम्बिक, न्यू कैलेडोनिया, पेरू, फिलीपींस, रूस, दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका शामिल हैं। इनमें से हर मिनरल की नए जमाने की इंडस्ट्रीज में काफी अहमियत है। भारत के पास इसमें से कोई भी मिनरल नहीं है। ऐसे में भारत को नए डिपॉजिट्स खोजने होंगे या विदेशों से गारंटीड सप्लाई सुनिश्चित करनी होगी। इकनॉमिस्ट प्रवण सेन का कहना है कि भारत को कुछ क्रिटिकल मटीरियल्स का भंडार बनाना चाहिए।

कितनी कम होगी कीमत
सरकारी और इंडस्ट्री के अनुमानों के मुताबिक 2030 तक भारत के ईवी मार्केट के एक करोड़ यूनिट के पार पहुंचने का अनुमान है। 2022 में यह 10 लाख यूनिट था। लेकिन यह तभी संभव होगा जब सप्लाई में कोई बड़ी अड़चन न आए। बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम्स में लीथियम की अहम भूमिका है। लीथियम की आसान और किफायती उपलब्धता से स्टोरेज बैटरीज की कीमत में भी कमी आएगी। इलेक्ट्रिक वीकल की कुल कीमत में 60 फीसदी हिस्सा बैटरी का ही होता है। इसी तरह देश में कॉपर और निकल की रिफाइनिंग से वीकल की कीमत में 15,000 से 20,000 रुपये की कमी हो सकती है।

कोबाल्ट का इस्तेमाल बैटरी के इलेक्ट्रोड्स, टरबाइन इंजन कंपोनेंट्स और ऑटोमोबाइल एयरबैग्स में होता है। इसी तरह निकल की सोलर पैनल, बैटरीज, एयरोस्पेस और डिफेंस एप्लिकेशन तथा ईवी में अहम भूमिका है। भारत इन दोनों का आयात करता है। इन मिनरल्स की प्रोसेसिंग में चीन का दबदबा है। यूरोप भी अब तेजी से इस दिशा में आगे बढ़ रहा है। दुनिया में 70 परसेंट कोबाल्ट का उत्पादन कॉन्गो में होता है।

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