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आर्टिकल 370: भारत की संप्रभुता को कभी चुनौती नहीं दी, सुप्रीम कोर्ट में कपिल सिब्बल की 5 बड़ी दलीलें

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सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 370 पर सुनवाई चल रही है। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की अध्‍यक्षता में पांच जजों की संविधान पीठ बैठी है। संविधान पीठ में सीजेआई के अलावा जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस सूर्यकांत भी शामिल हैं। मंगलवार को सुनवाई का 16वां और अंत‍िम दिन है। दोनों पक्षों की ओर से दलीलें पेश की जा चुकी हैं। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने नैशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और सांसद मोहम्मद अकबर लोन के हलफनामे के बारे में पूछा। दरअसल, कोर्ट ने लोन से कहा है कि वह हलफनामा दायर करके स्वीकार करें कि जम्मू कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और उनकी भारत के संविधान में पूरी निष्ठा है। सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कहा कि अनुच्छेद 370 पर संविधान की भावनात्मक बहुसंख्यकवादी व्याख्या नहीं की जाए। सुप्रीम कोर्ट में आर्टिकल 370 पर सुनवाई के सभी अपडेट्स देखिए।

अनुच्छेद 370 पर सुनवाई: सुप्रीम कोर्ट में क्‍या-क्‍या हुआ
मंगलवार को रिजाइंडर दलीलें पेश करते हुए सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने कहा, ‘एक बार विघटन हो गया तो 356 नहीं लगाया जा सकता। विघटन का कोई भी कार्य मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के बाद होना चाहिए।’
सिब्बल ने अदालत से कहा, ‘अगर आप संसद को 356 के तहत ऐसी शक्ति देंगे तो कुछ भी हो सकता है। मैं थोड़ा विषयांतर कर रहा हूं लेकिन महाराष्ट्र के संबंध में मैंने कहा था कि अगर महाराष्ट्र को बरकरार रखा गया तो यह दोबारा होगा और यह महाराष्ट्र में ही हुआ।’
सिब्बल ने कहा, ‘अब असंभवता पर आते हैं- एक ऐसा तर्क जो जवाबी हलफनामों में नहीं उठाया गया है… अगर कोई संवैधानिक दायित्व है और उसे निभाना ही है, तो असंभवता का सिद्धांत आता है… 370 के लिए बाध्यता कहां है? 370 कहता है ‘हो सकता है’, न कि ‘होगा’, असंभवता का प्रश्न कहां है? वे एक राज्य को केंद्रशासित प्रदेश कैसे बना सकते हैं? कानून के किस प्रावधान के तहत? किस शक्ति के तहत? राष्ट्रीय सुरक्षा की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। लेकिन उस राष्ट्रीय सुरक्षा स्थिति से 352 के तहत निपटा जा सकता है। 352-359 उससे निपटता है। तो आप अनुच्छेद 3 का उपयोग कैसे कर सकते हैं?’
उन्‍होंने कहा, ‘ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ऐसा किया। फरवरी 2019 में राष्ट्रपति शासन के दौरान पुलवामा हुआ। और फिर मई 2019 में चुनाव हुए। 4.5 साल तक राज्य का गठन नहीं करने का क्या औचित्य है?’
सिब्बल: आप कहते हैं कि आप नगरपालिका, स्थानीय प्रशासन के चुनाव कराने जा रहे हैं, पर्यटन बढ़ गया है। तो फिर बाधा क्या है? वह कौन सा संवैधानिक तर्क है जिसका उपयोग आप जम्मू-कश्मीर के लोगों को राज्य का दर्जा देने से इनकार करने के लिए कर सकते हैं?

सुप्रीम कोर्ट से कपिल सिब्‍बल की गुहार
अदालत को भारत के लोगों की ओर से बोलने दीजिए क्योंकि यह अदालत या कोई भी सरकार भारत के लोगों के लिए काम करती है। और ऐसा नहीं होना चाहिए कि भारत के अधिनियम तब जारी हों, जब भारत की जनता के एक हिस्से को चुप करा दिया गया हो।

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