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विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को लेकर SC के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कही ये बात

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नई दिल्ली,

इंटरनेशनल लॉयर्स कॉन्फ्रेंस के उद्घाटन सत्र में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलित सहयोग की बात पर जोर देते हुए कहा कि संविधान ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच मर्यादा और अधिकार क्षेत्र की स्पष्ट लक्ष्मण रेखा खींच रखी है. इसका एक आयाम यह भी है कि हम एक-दूसरे से काफी कुछ सीखते हैं. अब न्याय और शक्ति एक साथ आ गए हैं. शक्ति के बिना न्याय अक्षम है और न्याय के बिना शक्ति का कोई अर्थ नहीं रह जाता है.

विचारक ब्लेज पास्कल को उद्धृत करते हुए जस्टिस चंद्रचूड ने कहा कि न्याय और शक्ति को एक साथ लाना और आना होता है, ताकि जो कुछ भी न्यायोचित है वह समुचित शक्तिशाली भी हो.

सीजेआई ने कहा कि हम राष्ट्रीय न्यायालय हैं. जैसे-जैसे हम एक साथ मिल बैठकर सौहार्द के क्षण साझा करते हैं नए आयाम खुलते जाते हैं. मतभेदों से परे दोस्ती का यह विचार हल्का-फुल्का लग सकता है, लेकिन इसे बढ़ावा देने में ये भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. एक-दूसरे के नजरिए और मान्यता के प्रति परस्पर सम्मान और स्वीकार्यता जरूरी है. क्योंकि एक-दूसरे से सीखने के लिए हमेशा कुछ न कुछ नया रहता ही है.

जब हम न्याय प्रदान करने के साझा इरादे को मानते और जानते हैं तो हम एक ही टेबल पर बैठ कर आसानी से समाधान ढूंढ कर एक साथ आगे बढ़ सकते हैं. ये संविधान प्रदत्त शक्ति यानी पावर और न्याय प्रणाली का आपसी सहयोग और सहकारिता आम जनता के हित में सर्वश्रेष्ठ नतीजे देती है. इसीलिए ये कॉन्फ्रेंस सीखने और सिखाने जा बड़ा मंच है.

दुनिया भर से जज, वकील और न्याय वेत्ता यहां आए है जो आज के युग में जस्टिस डिलीवरी के क्षेत्र में चुनौतियों पर चर्चा कर रहे हैं. चर्चा के काफी उत्साह वर्धक नतीजे आएंगे. भारत की समृद्ध परंपरा में हमारा संविधान है जो विश्व के कई संविधान से प्रेरित अनूठी रचना है. विकसित दर्जे की ओर तेजी से बढ़ रहा भारत अंतराष्ट्रीय स्तर पर मध्यस्थता का केंद्र बना है.

मॉरीशस और भूटान में सुप्रीम कोर्ट की इमारत बनाने में सुप्रीम कोर्ट के विशेषज्ञों ने मदद की. लोकहित और जन सरोकारों से जुड़े मुकदमों की चर्चा करते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि रिक्शा चलाने वालों के मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट फैसला अदभुत और मील का पत्थर है क्योंकि ऐसे मुकदमे न्याय और शक्ति में संतुलन बनाते हैं.

सुप्रीम कोर्ट में संविधान पीठ एक मुकदमे की सुनवाई कर रही है जिसमें लाखों ऐसे ड्राइवरों पर पड़ेगा जिसमे बहस का विषय है कि क्या निजी ड्राइविंग लाइसेंस धारक कमर्शियल वाहन चला सकते हैं.

इस मामले में अदालत और सरकार दोनों लाखों ड्राइवरों की आजीविका को बचाने की कोशिश कर रहे हैं. भारतीय संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए विविध पृष्ठभूमि और विभिन्न क्षेत्रों के लोग एक साथ आए हमें वही द्विदलीय प्रयास मिलता है और संसद में महिला आरक्षण विधेयक को पारित करने में भी यही हुआ है.

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