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‘अब मृत्यु से सुंदर कुछ भी नहीं है’, DU की पूर्व प्रोफेसर ने क्यों मांगी इच्छामृत्यु?

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नई दिल्ली,

‘अब मृत्यु से सुंदर कुछ भी नहीं है….; मुझे इच्छा मृत्यु दी जाए. भारत के हर नागरिक से अपील करती हूं कि मैं ही हूं पार्वती. अब जिंदा लाश के शक्ल में तब्दील हो चुकी हूं. सत्यवती कॉलेज, सांध्य से निकाले जाने के बाद क्षण क्षण मर रही हूं.अब चाहती हूं कि सदैव के लिए मेरी यह पीड़ा खत्म हो जाए. ईश्वर ने आंख की रोशनी छीनी, तो लगा कि किसी तरह पार घाट उतर जाऊंगी. मुझे क्या पता था कि बौद्धिकों के समाज में भी मेरी जैसी अभागन की आत्मा को भी चाकू से रौंदकर लहूलुहान कर दिया जाएगा. मैं घबराई हुई हूं. ऐसा लगता कि मैं दुबारा अंधी हो गई हूं.दृष्टिहीन आंखों में गरम तेल डाल दिया गया हो. हे ईश्वर, तुम्हारा न्याय कहां गया? कुछ तो हमपर दया करो.

मैं जन्मांध पैदा नहीं हुई थी. दसवीं कक्षा में मेरी आंखों की रोशनी चली गई. मैं कोमा में चली गई. करीब तीन महीने बाद जब मुझे होश आया तो मैंने अपने आपको हॉस्पिटल में पाया. जहां मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था. मैंने पापा से पूछा यहां लाइट चली गई है? पापा ने कहा ‘बेटी लाइट जली हुई है’. फिर मैंने पापा से कहा ‘मुझे कुछ भी दिख नहीं रहा’. डॉक्टर को बुलाया गया. शुरू में न दिखने की समस्या को डॉक्टर ने मनोवैज्ञानिक बताया. बाद में भी रोशनी नहीं आई तो गहन जांच के बाद डॉक्टरों में मुझे अंधी घोषित कर दिया.

मेरे आगे एक पसरा हुआ सन्नाटा था. अबतक मैं अपने जीवन में अंधों को केवल भिखारन के रूप में देखी थी.मुझे लगता था कि मेरे घर के लोग मुझे भीख माँगने के लिए छोड़ देंगे या मुझे मार डालेंगे. बेहद गरीब परिवार से होने के कारण मैं अब परिवार के ऊपर बोझ थी. मुझे अपने मां, बाप और परिवार के लोगों से भी डर लगता था कि कहीं वह हमारी हत्या न कर दें. लेकिन मैं हारी नहीं और डरी नहीं.

मैंने इस समाज पर भरोसा किया, उनकी मानवता पर मुझे भरोसा था. मैं छड़ी के सहारे ही सही बंद आंखों से दुनिया को टटोलते हुए NIVH देहरादून गई. वहां मेरे जैसे बहुत सारे अभागे-अभागन थे. ब्रेल लिपि के माध्यम से मेरी पढ़ाई शुरू हो गई. देहरादून में पढ़ने के दरम्यान कई बार गंभीर मनोवैज्ञानिक परेशानी से भी गुजरी, लेकिन किसी तरह से बारहवीं पास करने के पश्चात दिल्ली यूनिवर्सिटी के आईपी कॉलेज से स्नातक, दौलत राम कॉलेज से एम.ए , जेएनयू से एमफिल और पीएचडी किया. मेरा जेआरएफ सामान्य श्रेणी में है. मेरी पुस्तक वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हैं. एक कहानी संग्रह है. बहुत सारे लेख हैं जो हिंदी की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपी हैं. लेकिन मुझे एक सामान्य बीए, एम.ए और नेट पास किए नए छात्र से रिप्लेस कर दिया गया. यह मेरी हत्या ही तो है, केवल हत्या…

अंधों के संघर्ष को आप नहीं जानते. जीवन के हर मोड़ पर मैं जूझती हूं. हमारी सारी इच्छाओं का दमन तो ईश्वर ने कर ही दिया था, इस घटना ने मानवता को शर्मशार कर दिया. आपको एक बात बताती हूं. हमारा समाज दिव्यांगों के प्रति संवेदनशील नहीं है. पुरुष के अंधेपन और महिला के अंधेपन में भी अंतर है. हम पर दोहरी मार पड़ती है. पुरुष को समाज में विशेषाधिकार प्राप्त है लेकिन महिला को?

मेरे जीवन की रोशनी यह तदर्थ की नौकरी थी. यह आशा और विश्वास हो चला था कि मेरी नौकरी स्थाई हो जाएगी. मैं किसी को शापित नहीं कर रही हूं, लेकिन आप सभी से गुहार जरूर लगा रही हूं कि देखिए आपका समाज कहां जा चुका है? केवल महाभारत में ही चीर-हरण नहीं हुआ था, आज भी अट्टहास के साथ मेरे साथ हुआ है. मेरी नौकरी मुझसे छीन ली गई. जीवन में अंधापन फिर से गहरा हो गया है. हताशा और अवसाद से फिर घिर गई हूं. मुझे लगता है कि मैं जीवन के उस मोड़ पर चली गई हूं जहां से अब मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा है. आत्महत्या करने का विचार तो कई बार आया, लेकिन मैं इच्छामृत्यु चाहती हूं… इसमें मेरी मदद कर दीजिए प्लीज़…
डॉ.पार्वती कुमारी (दृष्टि बाधित)
पूर्व प्राध्यापक हिंदी
सत्यवती कॉलेज
अशोक विहार, दिल्ली विश्वद्यालय, दिल्ली
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(यह लेख डॉ. पार्वती कुमारी की फेसबुक वॉल से हूबहू लिया गया है.)

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