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राष्ट्रवाद पर खेलना हुआ बेकार, बेदम कहानी और बचकाने VFX ने कंगना की झोली में डाली एक और फ्लॉप

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बड़े स्क्रीन पर अगर पाकिस्तान की बैंड बजाई जाए… चीख-चीख कर भारत की तारीफ हो और साथ में उसमें भारतीय सेना का एक मजबूत एंगल रहे, ऐसी फिल्मों को अब बॉलीवुड में ‘हिट’ का फॉर्मूला माना जाने लगा है। इस साल सनी देओल की गदर 2 तो इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जिसमें तारा सिंह ने पाकिस्तान की ऐसी लंका लगाई कि बॉक्स ऑफिस पर सारे रिकॉर्ड धुंआ-धुंआ हो गए। ऐसी सफलता देखकर उम्मीद तो कई मेकर्स को जगी, एक्ट्रेस कंगना रनौत में भी शायद उसी ऊर्जा का संचार हुआ था। तभी तो वे राष्ट्रवाद की पिच पर खेलते हुए नई फिल्म लेकर आ गई हैं, नाम है तेजस। सर्वेश मारवाह के निर्देशन में बनी इस फिल्म का सिंपल गोल है- लोगों के अंदर भरी पड़ी राष्ट्रवाद की फीलिंग पर खेलना, उस पर सवार होकर एक ऐसी फिल्म डिलीवर करना कि दर्शक कुर्सी की पेटी बांधे रह जाएं। लेकिन उम्मीद होना और उसका पूरा होना दो अलग बाते हैं, ऐसे में तेजस कंगना के करियर को नई उड़ान देने वाली है या इसकी क्रैश लैंडिंग हो जाएगी, ये हम बता देते हैं..

कहानी
विंग कंमाडर तेजस गिल (कंगना रनौत) एक ऐसी बहादुर लड़की है जिसे सिर्फ हवाओं से बात करने का शौक नहीं है, बल्कि वो देश की खातिर अपनी जान की भी बाजी लगाने को हर पाल तैयार रहती है। उसकी शख्सियत की एक खासियत है, बात जब भी देश की आती है, वो कई बार अपने सीनियर्स के ऑर्डर भी मानने से मना कर जाती है। लेकिन क्योंकि उसने कई मौकों पर अपनी काबिलियत को साबित किया है, ऐसे में भारतीय वायुसेना भी उस विंग कमांडर पर पूरा भरोसा करती है। उसी भरोसे की वजह से तेजस गिल के सामने एक बड़ा ऑपरेशन आता है। खतूनी नाम के आतंकी ने पाकिस्तान में भारत के जासूस प्रशांत को पकड़ रखा है। उसका रेस्क्यू करने के लिए तेजस को पाकिस्तान जाना होगा, साथ देने के लिए उसकी को पायलट आफ्या (अंशुल चौहान) भी रहेगी। अब किस तरह से पाकिस्तान के अंदर घुसकर इस मिशन को पूरा किया जाता है, आखिर कैसे भारत के जासूस प्रशांत को बचाया जाता है, इन्हीं दो सवालों के इर्द-गिर्द पूरी फिल्म की कहानी रहती है।

जो सबसे बड़ी ताकत, उसी ने डुबोई लुटिया!
तेजस एक ऐस फिल्म के रूप में सामने आई है जिसकी सबसे बड़ी ताकत ही इस बार उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन गई है। ये फिल्म पूरे दो घंटे की भी नहीं है, यानी कि मेकर्स ने बेमतलब खीचने की कोई कोशिश नहीं की। अब कहानी को खीचना नहीं, लेकिन डेवलप करना तो जरूरी रहता है, इतनी भूमिका तो बांधनी ही पड़ती है कि आगे मेकर्स क्या दिखाने वाले है, उसको लेकर माहौल सेट हो जाए. इसी डिपार्टमेंट में सबसे पहले कंगना की फिल्म ने मात खाई है। फिल्म का पहला हाफ सिर्फ फ्लैशबैक और प्रेंजेंट डे के खेल में फंसा रहता है। कभी अचानक तेजस के शुरुआती दिन दिखाए जाते हैं, फिर कभी बीच में लव स्टोरी घुसा दी जाती है। इनमें से किसी भी ट्रैक का कोई सेंस बन सके, उससे पहले ये फिल्म दूसरे किसी पहलू पर जंप कर जाती है। पूरा पहला हाफ इसी तरह से आगे बढ़ता है और जिस मिशन पर इस फिल्म को बनाया गया है, वो कही पीछे छूटता दिख जाता है।

कहानी एकदम फ्लैट, मेन प्लॉट पर नहीं दिया ध्यान
फिल्म का सेंकड हाफ काफी ज्यादा फार्स्ट पेस्ड होना चाहिए था। जब पहले एक घंटे में सिर्फ अलग-अलग टुकड़ों की बात की गई है, उस स्थिति में तो और एक्शन पैक अंदाज की उम्मीद थी। लेकिन वहां भी निराशा ही हाथ लगी क्योंकि जब कोई इतने बड़े मिशन पर जाता है, उसकी एक अपनी टेंशन होती है, थोड़ा बहुत थ्रिल भी रहता है। लेकिन तेजस देखते समय ऐसी फीलिंग बहुत कम बार ही उफान मारती है और सबकुछ काफी फ्लैट सा दिखाई पड़ता है। इसका शायद एक कारण ये भी है कि तेजस की कहानी में लेयर्स की कमी है। एक्स्ट्रा एलिमेंट के नाम पर लव स्टोरी और कुछ बचकाने डायलॉग्स जोड़ने की जहमत तो की गई है, लेकिन जिस मिशन पर इसे बनाया गया है, उसके बारे ज्यादा जानकारी अंत तक दर्शकों को नहीं मिलती।

कंगना की मेहनत, डायलॉग डिलीवरी ने बिगाड़ा खेल
अब कहानी की कमियों को नजरअंदाज किया जा सकता है, अगर एक्टिंग डिपार्टमेंट कुछ आउट ऑफ द वर्ल्ड जैसा काम कर दे। लेकिन ऐसा चमत्कार भी तेजस के साथ तो नहीं हुआ है। इसमें कोई शक नहीं ये पूरी फिल्म कंगना रनौत के कंधों पर टिकी हुई है। उनकी मेहनत पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता, लेकिन जिस तरह से उनके किरदार को गढ़ा गया है, कई तरह की कसक मन में रह जाती हैं। जब भी स्क्रीन पर वे एयरफोर्स की यूनिफॉर्म में आती हैं, बिल्कुल रोंगटे खड़े हो जाते हैं, लेकिन जैसे ही उनकी डायलॉग डिलीवरी होती है, वो इंप्रेशन उतना ही फीका हो जाता है। यानी कि डायलॉग्स पर काफी काम किया जा सकता था।

सिर्फ इस एक्टर का चला सिक्का, अनुभव का दिखा कमाल
फिल्म में कंगना के साथ-साथ अंशुल चौहान को भी काफी स्क्रीन स्पेस दिया गया है। कमाल तो उन्होंने भी कोई नहीं किया है, लेकिन हां एक ठीक-ठाक परफॉर्मेंस कहा जा सकता है। उनसे मेकर्स ने कहानी में जितने सपोर्ट की उम्मीद की होगी, वो दे दिया गया। हां इस फिल्म में अगर कोई सही मायनों में आउटशाइन किया है तो वे आशीष विद्यार्थी हैं। वे कंगना के ही फिल्म में सीनियर बने हैं, लेकिन कैसा एक एयर फोर्स ऑफिसर होना चाहिए, उनकी एक्टिंग देख साफ समझा जा सकता है। उनका अनुभव स्क्रीन पर पूरी तरह रंग लाया है और वे बेहतरीन लगे हैं। इसी कड़ी में अगर भारतीय जासूस बने विशाक नायर की बात करें तो उन्होंने औसत प्रदर्शन तो कर ही दिया है। यहां ये बताना जरूरी है कि उनके किरदार को ज्यादा स्पेस मिलनी चाहिए थी, उन्हीं के इर्द-गिर्द ये मिशन रहा है, ऐसे में उनके किरदार का और डेवलप होना लाजिमी था। लेकिन मेकर्स यहां पर भी चूक गए हैं। फिल्म में वरुण मित्रा जैसे कई और सहकलाकार भी मौजूद हैं जिनका काम भी एवरेज रहा है।

डायरेक्टर का सबसे बड़ा फेलियर और खराब VFX की सौगात
अब कहानी की बात हो गई, एक्टिंग डिपार्टमेंट का अंदाजा भी लग गया, लेकिन फिल्म का निर्देशन भी इसका एक बड़ा लूपहोल है। अगर कोई फिल्म राष्ट्रवाद जैसे जॉनर के साथ बन रही हो, इतनी उम्मीद तो रखी ही जाएगी लगातार आपके अंदर की देशभक्ति उछाल मारेगी। लेकिन तेजस देखते समय शायद एक बार भी ऐसा मौका नहीं आया है, ये एक बड़ा फेलियर है। इमोशन्स ठीक तरह से नहीं परोसे गए हैं जिस वजह से कई हाई इमपैक्ट सीन भी बिल्कुल नीरस बन गए हैं। इसके ऊपर तेजस में जिस स्तर के VFX का इस्तेमाल हुआ है, वो देख हैरानी होती है। एक तरफ बॉलीवुड जहां इतनी तरक्की कर रहा है, दूसरी तरफ तेजस के मेकर्स ने बिल्कुल ही कार्टूनिश जैसे VFX बना दिए हैं। एक्शन सीन्स में एक नहीं कई बार आपको ऐसा लगेगा कि ये कोई वीडियो गेम चल रहा है और वहां भी खराब ग्राफिक्स दिखाए जा रहे हैं।

फिल्म का जो बैकग्राउंड स्कोर है, वो कहीं-कहीं पर उरी फिल्म जैसा सुनाई पड़ता है। लेकिन उस सुपरहिट फिल्म वाला कोई भी पहलू तेजस के साथ जोड़कर नहीं देखा जा सकता। यानी कि कई फ्लॉप फिल्म दे चुकीं कंगना रनौत को एक और फ्लॉप के लिए तैयार रहना चाहिए। फिल्म की एडवांस बुकिंग तो पहले ही स्लो थी, वर्ड ऑफ माउथ भी जैसा मिल रहा है, उसे देखते हुए इसका बॉक्स ऑफिस ज्यादा लंबा टिकना भी मुश्किल लगता है।

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