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अक्टूबर में महंगाई डायन से मिली राहत, जानिए कब कम होगी आपके लोन की EMI?

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नई दिल्ली

महंगाई के मोर्चे पर अच्छी खबर है। खाने-पीने का सामान सस्ता होने से अक्टूबर में खुदरा महंगाई में नरमी आई और यह चार महीने के निचले स्तर 4.87 प्रतिशत पर रही। सोमवार को जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा महंगाई सितंबर में तीन महीने के निचले स्तर 5.02 प्रतिशत थी। इससे पहले, जून में महंगाई दर 4.87 प्रतिशत दर्ज की गई थी। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने अक्टूबर बैठक में चालू वित्त वर्ष 2023-24 में खुदरा महंगाई 5.4 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। यह 2022-23 के 6.7 प्रतिशत के मुकाबले कम है।

सरकार ने आरबीआई को खुदरा महंगाई दर दो प्रतिशत घट-बढ़ के साथ चार प्रतिशत पर रखने की जिम्मेदारी दी हुई है। केंद्रीय बैंक द्विमासिक मौद्रिक नीति पर विचार करते समय मुख्य रूप से खुदरा महंगाई पर गौर करता है। अक्टूबर में लगातार दूसरे महीने खुदरा महंगाई आरबीआई के अपर टॉलरेंस बैंड के ऊपरी स्तर से नीचे रही है। आरबीआई की एमपीसी ने लगातार चार बार रेपो रेट में कोई बदलाव नहीं किया है। कमेटी का कहना है कि उसका फोकस महंगाई को चार परसेंट के टारगेट के करीब लाने पर है।

कब कम होगी EMI
आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास ने अक्टूबर की शुरुआत में कहा था कि केंद्रीय बैंक सतर्क है और महंगाई के टारगेट को हासिल करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। गुरुवार को एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि हाल में महंगाई में कमी आई है लेकिन खाने-पीने की कीमतों में बार-बार हो रही बढ़ोतरी से महंगाई बढ़ने का खतरा लगातार बना हुआ है। माना जा रहा है कि आरबीआई अगले साल जून तक रेपो रेट को 6.5 परसेंट पर बनाए रख सकता है। उसके बाद इसमें 25 बेसिस पॉइंट की कटौती की जा सकती है। आरबीआई ने महंगाई पर काबू करने के लिए पिछले साल मई से इस साल फरवरी तक रेपो रेट में 2.5 परसेंट की बढ़ोतरी की थी।

रेपो रेट वह दर होती है, जिस पर आरबीआई कमर्शियल बैकों को लोन देता है। जब रेपो रेट बढ़ती है, तो बैकों को आरबीआई से मिलने वाला लोन महंगा हो जाता है। ऐसे में वे इसका बोझ ग्राहकों पर डालते हैं। वे होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन जैसे सभी लोन्स पर ब्याज दरों को बढ़ा देते हैं। आरबीआई महंगाई में कमी लाने के लिए बाजार में लिक्विडिटी घटाता है। ऐसा वह रेपो रेट बढ़ाकर करता है। दूसरी ओर रेपो रेट कम होने से बैंकों के लिए लोन सस्ता हो जाता है। इसका फायदा वह ग्राहकों को देते हैं।

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