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RBI के पूर्व गवर्नर वेंकिटरमणन का निधन, देश को भुगतान संतुलन के संकट से निकाला था बाहर

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नई दिल्ली

आरबीआई के पूर्व गवर्नर एस वेंकिटरमणन का निधन हो गया है। वह 92 साल के थे। वह दिसंबर 1990 से लेकर दिसंबर 1992 के दौरान आरबीआई के गवर्नर रहे थे। इस दौरान देश को भारी आर्थिक संकट से गुजरना पड़ा था। हालत यह हो गई थी कि देश को डिफॉल्ट होने से बचने के लिए अपना सोना गिरवी रखना पड़ा था। इसके बाद देश एक्सचेंज रेट के संकट से भी गुजर रहा था। उनके कार्यकाल में भारत ने आईएमएफ के स्थिरीकरण कार्यक्रम को अपनाया, जहां रुपये का अवमूल्यन हुआ और आर्थिक सुधार कार्यक्रम शुरू किया गया। अपने कुशल मैनेजमेंट से उन्होंने देश को भुगतान संतुलन के संकट से निकालने में सफलता पाई थी। उनके कार्यकाल में आरबीआई ने रुपये का अवमूल्यन करके भारतीय एक्सपोर्ट को प्रतिस्पर्द्धी बनाया और आयात का बोझ कम किया।

एस वेंकिटरमणन का जन्म 1931 में नागरकोइल में हुआ था जो उस समय त्रावणकोर रियासत का हिस्सा था। जब दिसंबर 1992 में उन्होंने आरबीआई की कमान संभाली तो उस समय देश गंभीर भुगतान संकट का सामना कर रहा था। वेंकिटरमणन के बाद आरबीआई के गवर्नर बने सी रंगराजन के मुताबिक उस समय स्थिति इतनी काफी बदतर हो गई थी कि रुपये का अवमूल्यन अपरिहार्य हो गया था। इस बात पर चर्चा हो रही थी कि इसे कैसे किया जाए। राजनीतिक नेतृत्व से मंजूरी मिलने के बाद गवर्नर वेंकिटरमणन ने इसे लागू किया। रुपये के अवमूल्यन से बाहरी असंतुलन को नए सिरे से एडजसस्ट किया गया। इसके बाद कई सुधार किए गए जिनमें विनियम दर की व्यवस्था में सुधार शामिल था।

डिफॉल्ट की आशंका
आरबीआई के गवर्नर रहे वाईवी रेड्डी के मुताबिक सरकार में बैठे अधिकांश लोग डिफॉल्ट होने के बार में सोच भी नहीं रहे थे लेकिन गवर्नर वेंकिटरमणन ने आरबीआई को गुपचुप तरीके से डिजास्टर मैनेजमेंट पर टेक्निकल काम करने का आदेश दिया ताकि अगर चीजें हाथ से बाहर जाती हैं तो उसके लिए पूरी तैयारी हो। जब करेंट अकाउंट कन्वर्टिबिलिटी पर बहस हो रही थी तो वेंकिटरमणन कैपिटल गुड्स के आयात की अनुमति देने में सावधानी बरतने के पक्ष में थे। उनका मानना था कि ऐसा करने से यूएस डॉलर की डिमांड में अचानक तेजी आ सकती है।

वेंकिटरमणन तेजी से फैसले लेने के लिए जाने जाते थे। उनके कार्यकाल में मनी मार्केट्स में सुधार के लिए कई छोटे-छोटे कदम उठाए गए। बैंकों ने मनी मार्केट म्यूचुअल फंड्स को उसी दौर में शुरू किया था। साथ ही उन्होंने आईडीबीआई और नाबार्ड की भूमिका का भी विस्तार किया था। पहली बार 364 डे ट्रेजरी बिल्स की आरबीआई के सपोर्ट के बिना नीलामी की गई थी। देश का सबसे बड़ा स्टॉक मार्केट घोटाला भी 1992 में उन्हीं के दौर में सामने आया था। शेयर दलाल हर्षद मेहता और कई दूसरे लोगों पर शेयरों की कीमत में हेरफेर करने का आरोप लगा। बॉन्ड मार्केट भी इसकी चपेट में आया और आरबीआई ने इसमें सुधार किए।

सेबी प्रमुख से मतभेद
इससे वेंकिटरमणन और सेबी के तत्कालीन प्रमुख जीवी रामकृष्ण के बीच मतभेद हो गए थे। हालत यहां तक पहुंच गई थी कि दोनों मिलने के लिए भी तैयार नहीं थे। तब सेबी बोर्ड के सदस्य रेड्डी ने फाइनेंशियल मार्केट्स के मुद्दों पर चर्चा करने के लिए गवर्नर के नेतृत्व में एक कमेटी बनाई। रेड्डी कहते हैं, ‘मुझे लगता था कि अगर किसी व्यक्ति ने भुगतान संतुलन के संकट को मैनेज करने में असाधारण नेतृत्व दिखाया था तो वह आरबीआई गवर्नर के तौर पर वेंकिटरमणन ही थे।’

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