नई दिल्ली,
दशकों पुराने श्रीराम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया था. देश की शीर्ष अदालत ने विवादित भूमि पर राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ करते हुए इसे एक ट्रस्ट को सौंपने का आदेश सुनाया था. साथ ही केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को मस्जिद बनाने के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को वैकल्पिक 5 एकड़ जमीन उपलब्ध कराने के लिए कहा था.
तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली उस संविधान पीठ में जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस अब्दुल नजीर के अलावा वर्तमान मुख्य न्यायाधीश धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ भी शामिल थे. उन्होंने सर्वसम्मति से लिए गए उस फैसले के बारे में एक समाचार एजेंसी से विस्तार से बातचीत की है. उन्होंने कहा, ‘दशकों पुराने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में अपना अंतिम फैसला सुनाते समय, सुप्रीम कोर्ट ने संघर्ष के लंबे इतिहास को ध्यान में रखा और एक स्वर में बोलने का फैसला किया’.
ऐतिहासिक फैसले से 134 साल पुरानी कानूनी लड़ाई का पटाक्षेप हुआ
देश के सर्वोच्च न्यायाधीश ने कहा, ‘अयोध्या मामले में न्यायाधीशों ने सर्वसम्मति से यह तय किया कि फैसले की कॉपी पर किसी का नाम नहीं जाएगा’. इस ऐतिहासिक फैसले ने 134 साल पुरानी कानूनी लड़ाई का पटाक्षेप किया था और अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया. हालांकि, पीठ ने अपने फैसले में कहा था कि बाबरी मस्जिद का विध्वंस, जिसका ढांचा 1992 तक विवादित स्थल पर मौजूद था, अवैध था.
अयोध्या मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा 22 जनवरी 2024 को होगी
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तीन साल से थोड़े अधिक समय बाद, अयोध्या में भक्तों के भव्य राम मंदिर के द्वार खुलने वाले हैं. पीएम मोदी ने 5 अगस्त 2020 को मंदिर का शिलान्यास किया था, और इसका उद्घाटन 22 जनवरी 2024 को होना निर्धारित है. इसी दिन मंदिर के गर्भगृह में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होगी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस आयोजन में मुख्य यजमान के रूप में उपस्थित रहेंगे. उन्होंने अपनी हालिया अयोध्या यात्रा के दौरान कहा था कि राम मंदिर का उद्घाटन एक ‘ऐतिहासिक’ क्षण होगा.
