प्रेम में हमेशा मिलेंगे तो दो, लेकिन रहेगा एक, एक अपना अस्तित्व ही समाप्त कर देता है
भोपाल.
अवधपुरी वायु रॉयल एनक्लेव, ईडन गार्डन गेट वेदवती ग्राउंड अमरावद खुर्द में चल रही श्रीराम कथा के छठवे दिन अंतरराष्ट्रीय कथाकार, समाज सुधारक आचार्य मनोज अवस्थी महाराज ने भरत मिलाप का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि जब देवराज इंद्र ने गुरु बृहस्पति से यह कहा कि भरत और राम जी मिलने ना पाएं। क्योंकि भरत राम से मिलेंगे तो वह राम को अयोध्या लौटने को कहेंगे और भरत जी की बात राम जी जरूर मानेंगे। इस बात पर गुरु बृहस्पति ने कहा कि राम जी वही करेंगे जो भरत कहेंगे, लेकिन भरत वही कहेंगे जो राम जी चाहेंगे।
राम और भरत को जब तक हम अलग-अलग निगाहों से देखते रहेंगे, तब तक राम और भरत के चरित्र को हम नहीं समझ सकते। प्रेम में हमेशा मिलेंगे तो दो, लेकिन रहेगा एक। एक अपना अस्तित्व ही समाप्त कर देता है। महाराज ने बताया कि प्रेम का भाव चाहे वह परमात्मा से हो या संसार से हो उसमें एकात्म भाव होता है, जिसमें हमेशा मिलते तो दो हैं, लेकिन हमेशा रहता एक है।
भरत ने गुरु वशिष्ठ से कहा कि गुरु जी राम अयोध्या लौट जाएं, तो मैं सारी जिंदगी जंगल में रहने के लिए तैयार हूं, क्योंकि प्रेम अपने प्रेमाश्वत का सुख देखता है, प्रेमाश्वत को खुशी देना चाहता है। जब राम और भरत चित्रकूट में मिले तो, उस प्रीति का वर्णन कवियों के लिए लिखना, सुनना और कहना संभव नहीं है। राम और भरत का मिलन आत्मा से परमात्मा का मिलन जैसा है, जो एक दूसरे में मिलकर एक दूसरे में समा जाते हैं और संसार केवल देखता ही रह जाता है।
महाराज ने बताया कि राम ने अपनी चरण पादुका भरत को दे दी, जिसे लेकर भरत अयोध्या लौट आए। अयोध्या के कार्यवाहक राजा के रूप में नंदीग्राम में रहकर अयोध्या की सेवा की। महाराज ने बताया कि गोस्वामी तुलसीदास को भी राम जी मिले तो केवल भरत जी की वजह से ही मिले। आगे आरण्य कांड का वर्णन करते हुए महाराज ने सुनाया कि जब श्री राम और आगे बढ़े तो दंडक वन में साधुओं की अस्थियों का ढेर देखने को मिला, जिस पर राम जी को क्रोध आ गया और उन्होंने प्रतिज्ञा ली कि मैं इस धरती को निशाचारों से विहीन कर दूंगा।
रावण की बहन सूर्पनखा अपनी समीक्षा करने पहुंची और राम जी से कहा कि आप जैसा पुरुष और मेरे जैसी नारी नहीं है। इस पर लक्ष्मण ने सूर्पनखा को नाक-कान विहीन कर दिया। इसके बाद राम जी ने खरदूषण, तृष्णा का उद्धार किया। इसके बाद रावण द्वारा माता जानकी का हरण करके लंका ले जाने की कथा सुनाई। कथा में मुख्य यजमान सरिता सिंह (खुशबू) उदय प्रताप सिंह हैं।
