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अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा: कैसा होना चाहिये प्रभु श्री राम का स्वरूप

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भोपाल।

अयोध्या में भव्य श्रीराम मंदिर में रामलला के प्राण प्रतिष्ठा के लिए तैयारियां जोर-शोर से पूरी की जा रही हैं। सात हजार विशेष मेहमान और चार हजार संतों की मौजूदगी में पौष शुक्ल पक्ष द्वादशी और मृगशिरा नक्षत्र और इन्द्र योग यानी 22 जनवरी को रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा होगी। इस मौके पर विश्व के 50 देशों और सभी राज्यों से करीब 20 हजार अतिथि भी अयोध्या में मौजूद रहेंगे।

राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा के लिए कर्नाटक के श्री अरूण योगीराज की बनाई राम लाला की मूर्ति चुनी गयी है पर इसका स्वरूप रंग रूप अभी किसी को प्रदर्शित नहीं किया गया है पर यह आशा करते हैं कि यह तुलसीदास द्वारा लिखित ग्रंथों के अनुसार होंगे ।

ज्ञात रहे कि तुलसीदास जी ने वास्तविक रूप में भगवान श्री राम के दर्शन महावीर श्री हनुमान जी की कृपा से चित्रकूट घाट पर किए थे महाकवि तुलसीदास जी द्वारा रचित विनय पत्रिका में तथा रामचरित मानस के बाल कांड में राम स्तुति बताईं गई है और यह हरगीतिका छंद रूप में लिखी गयी है और राग गौरी में श्री राम चंद्र कृपालु भजमन, रूप से गयी और की जाती है । अब देखते है की तुलसीदास जी ने राम के स्वरुप को कुछ छंदो में कैसे चित्रित किया है

श्री राम चंद्र कृपालु भजुमन हरण भवभय दारुणम
नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं
है मन करुणा के सागर प्रभु श्री राम को नित्य भज जो भवसागर के जन्म मृत्यु रुपी कष्टों को हरने वाले हैं उनके नयन खिले कमल की भांति है और पैर भी लाल रंग के कमल की भांति है।

कंदर्प आगणित छवि नवनील नीरद सुंदरम
पाट पीट मानहु तप्ति रूचि शुचि नौमी जनक सुतावरं
उनकी सुंदरता अनेकों कामदेवो (जिनका स्वरूप हमेशा युवा और आकर्षक होता है) से अधिक है, उनके तन का रंग नीले जलपूर्ण बादल की तरह सुंदर हैं,पीताम्बर से आवृत्त मेघ के समान तन विद्युत के समान प्रकाशमान है, ऐसे पवित्र रूप को धारण किए प्रभु राम जी को में नमन करता हूं

सर मुकुट कुण्डल तिलक चारु उदारु आंग विभुषणं
आजानुभुज शर चाप धार संग्राम जित खरर्दुशणं
श्री राम के शिर पर रत्नों से मंडित मुकुट है कानों में कुंडल विद्यमान है माथे पर तिलक हैं और अंग अंग में मनोहर आभूषण शोभायमान है, उनकी भुजाएं घुटनों तक लंबी है तथा वह धनुष बाण धारण किए हुए हैं और संग्राम में खर दूषण को पराजित करा हैं।

वैसे तो तुलसीदासजी ने यह भी लिखा है। जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।अर्थात भगवान राम की छवि को इस एक दोहे में तुलसीदासजी ने व्यक्त कर दिया है और कह दिया है कि प्रभु की छवि तो मनुष्य के मन के अनुरूप है। जो जिस भावना से उन्हें देखता है उसी रूप में प्रभु उसे नजर आते हैं।

अन्य ग्रंथों में भी भगवान श्री राम का चेहरा चंद्रमा की तरह चमकीला, सौम्य, कोमल और सुंदर था। उनकी आंखे कमल की भांति खबसूरत और बड़ी थी। उनकी नाक उनके चेहरे की तरह ही लंबी और सुडौल थी। उनके होठों का रंग सूर्य के रंग की तरह लाल था और उनके दोनों होठ समान थे। उनके कान बड़े थे और उनके कानों में कुंडल बहुत ही शोभा देते थे। उनके हाथ लंबे घुटने तक थे। जिस वजह से उन्हें आजानुभुज कहा जाता है। उनके केश भी बहुत घने, सुंदर और लंबे थे, तथा
श्री राम हर समय बला अतिबला की सुरक्षा ऊर्जा से घिरे हुए हैं जो उनको गायत्री मंत्र की अस्त्र विद्या से प्राप्त हुई हैं । अब यह देखना बड़ा दिलचस्प होगा कि अरूण योगीराज ने श्री राम के बाल रूपी मूर्ति में तुलसीदास के द्वारा रचित राम स्तुति में राम रूप वर्णन को कहां तक शामिल किया है।

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