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न्यायपालिका की आजादी और ताकत कम हुई है, इसमें कोई शक नहीं- सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील दुष्यंत दवे ने उठाया सवाल

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नई दिल्ली

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर अक्सर खुल कर लिखने और बोलने वाले सुप्रीम कोर्ट के सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने सवाल उठाया है कि आखिर पिछले 10 साल से सरकार कोई भी महत्वपूर्ण केस हार क्यों नहीं रही है? वह इस विषय को संदेहास्पद मानते हैं।जनसत्ता डॉट कॉम के संपादक से बातचीत में दवे ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि न्यायपालिका बहुत ही कमजोर हो चुकी है। पिछले 10 साल में सरकार कोई महत्वपूर्ण केस नहीं हारी है। इसका क्या मतलब हुआ? यह कहना बहुत मुश्किल है कि क्या चल रहा है।”

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर बात करते हुए दवे ने कहा, “संविधान में न्यायपालिका को जितनी स्वतंत्रता दी गई है, आज न्यायपालिका उतनी स्वतंत्र नहीं है। हमें इस समस्या की तरफ ध्यान देना चाहिए। अच्छे जजों को इस पर चुप्पी नहीं साधनी चाहिए। जब वह बेंच में हैं तभी उन्हें बोलना चाहिए। बाहर निकलने (रिटायर होने) के बाद बोलने का कोई फायदा नहीं है।”

दवे आगे कहते हैं, “आज ऐसी हालत है कि सुनवाई होने के बाद भी जज एक-एक, दो-दो साल तक फैसला नहीं सुनाते हैं। मुझे याद है, मैंने जब प्रैक्टिस शुरू की थी… मैंने अपने जज पिता को भी देखा है… केस की सुनवाई खत्म होने के बाद वहीं पर फैसला लिखना शुरू कर देते थे ताकि कोई संपर्क भी न कर सके (फैसला प्रभाव‍ित करवाने के मकसद से)।”

सिस्टम को ठीक करने में बार की भूमिका क्या है?
दवे मानते हैं कि सिस्टम को ठीक रखना बार का भी दायित्व है, अगर सिस्टम खराब हो रहा है तो उसके लिए बार भी जिम्मेदार है। वह कहते हैं, “जस्टिस अरुण मिश्रा ने अपने एक फैसले में लिखा है कि बार की संवैधानिक ड्यूटी है। एक चीज समझ लीजिए। आजादी की लड़ाई में सबसे आगे वकील थे। गांधी, नेहरू, पटेल… अगर उनमें ऐसी हिम्मत थी तो बार में ऐसी हिम्मत क्यों नहीं है? हम क्यों नहीं जनता द्वारा संवैधानिक तरीके से चुनी सरकारों और न‍ियुक्‍त क‍िए गए जजों को आईना दिखा सकते हैं?”

“इमरजेंसी में भी यही हुआ”
हाल के समय में ऐसा लगता है क‍ि सरकार, सुप्रीम कोर्ट की बात नहीं सुन रही है। उदाहरण के लिए CEC अपॉइंटमेंट मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा उसे सरकार ने सिरे से खारिज कर दिया। इस तरह के मामले सिस्टम को कहां ले जाएंगे? इस सवाल के जवाब में दवे ने कहा, “अगर हमारी सुप्रीम कोर्ट में इतनी ताकत नहीं है तो फिर क्या हो सकता है? देखिए, इमरजेंसी में भी यही हुआ। एडीएम जबलपुर के केस में जब सुप्रीम कोर्ट के सामने मामला आया कि आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकार को छीना जा सकता है या नहीं… तो ज्यादातर जज ने माना कि अधिकार लिए जा सकते हैं। इस वजह से आपातकाल के दौरान हमारे पास मौलिक अधिकार ही नहीं था। आज भी वैसा कर सकते हैं। उस जजमेंट में वर्तमान सीजेआई के पिता वाईवी चंद्रचूड़ भी शामिल थे। जस्टिस भगवती भी शामिल थे, जो खुद को आम लोगों का जज कहा करते थे। तब एक ही जज देशवासियों के लिए खड़ा हुआ था- वो थे जस्टिस एचआर खन्ना।”

दवे आगे कहते हैं, “सब कुछ न्यायपालिका पर निर्भर करता है। आप संविधान सभा की डिबेट देखिए। वो न्यायपालिका को ऐसा बनाना चाहते थे जो सरकार पर नजर रखे। संसद या विधानसभाओं द्वारा बनाए असंवैधानिक कानून को असंवैधानिक करार दे। डॉ अंबेडकर और केटी शाह से लेकर कई लोगों ने उस डिबेट में अपने विचार रखे थे। अगर आज वो लोग (फाउंडिंग फादर्स) हमारी न्यायपालिका को देखेंगे तो ताज्जुब करेंगे। वो सोचेंगे कि क्या हमने देश को इस हालत के लिए संविधान दिया था।”

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