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Monday, May 4, 2026
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रातभर गाड़ियां लाश रौंदती रहीं, अंगुली से पता चला आदमी मरा है.. दो हादसे पर हमें अफसोस तक क्यों नहीं होता?

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आगरा

जब किसी अपने को दुख होता तभी हम क्यों दुखी होते हैं? ये सवाल इसलिए भी उठ रहा है कि जिस तरह से सड़क दुर्घटना में मृतकों को लावारिस छोड़कर हम अपने गंतव्य की ओर भागने लगते हैं वो दर्द देता है। हम इंसान है। क्या ऐसी चीजों से हमें दुखी नहीं करतीं? सृष्टि में पाए जानी वाली 84 लाख योनियों में हमें सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। जानवर और हम सभी ये फर्क हैं कि हम सोच सकते हैं। पिछले काफी वक्त से यही सोच रहा हूं कि आखिर हम कहां आ गए हैं। कहा जाता है कि मरे हुए व्यक्ति को सम्मान दिया जाना चाहिए। लेकिन आगरा और गाजियाबाद की दो खबरों ने मन बोझिल कर रखा है। आखिर कहां चली गई है हमारी मानवता? सोचकर मन कांप रहा है। मौत के बाद सम्मान देने की बात तो भूल जाइए अब तो यहां मौत का मातम भी नहीं मनाया जा रहा है।

आइए समझते हैं कि आखिर क्यों इतना विषाद है। आखिर क्यों इतना व्याकुल हुआ जा रहा हूं? आगरा-लखनऊ एक्सप्रेस-वे पर एक शख्स को बिजली की रफ्तार से दौड़ती गाड़ियों में से किसी एक ने रौंद दिया। रात के वक्त हुए इस हादसे की जानकारी किसी ने पुलिस को देने की जहमत ही नहीं उठाई। सोमवार को जब पुलिस को शव मिला तो उसकी हालत बयां करने लायक नहीं रही। रातभर एक्सप्रेस-वे पर दौड़ती गाडियों के पहियों ने उसे कुचल-कुचलकर का सड़क से चिपका दिया। शव सड़क से ऐसा चिपका था कि पुलिस को खुरचकर उसके टुकड़े निकालने पड़े। शव के नाम पर पास की उस अभागे शख्स की एक अंगुली पड़ी थी। इस खबर पढ़ने के बाद मुझे एक घटना की याद आ गई। मेरे शहर में एक गाड़ी ने एक बंदर को कुचल दिया। बंदर की मौत के बाद उसे सभी साथी आसपास के पेड़ों से उतरकर सड़क पर आ गए। और वो अपने साथी के शव को सड़क से घसीटते हुए दूर ले गए। इस दौरान वहां मौजूद बंदरों ने काफी देर तक सड़क को जाम किए रखा। कहना केवल इतना चाहता हूं कि जब जानवरों में इतना समझ है तो चांद पर पहुंच जाने वाले हम जैसे इंसानों को ये क्यों नहीं आता?

आखिर हम इतने बेदिल क्यों हो गए हैं? हर किसी की मौत की तारीख तो तय है लेकिन उस अंतिम सत्य के बाद हम क्या किसी मृतक को सम्मान नहीं दे सकते? अगर हाइवे पर किसी की मौत हो जाती है तो क्या हम किसी के शव को सड़क के किनारे नहीं कर सकते? इतना तो कर ही सकते हैं। लेकिन हमें हुआ क्या है, शव को किनारे रखने की बात तो छोड़िए हम उसे रौंदते चले गए। मृतक के शव का ऐसा हाल कर दिया कि उसकी पहचान तक होनी मुश्किल है। एक देश के तौर पर हमने काफी तरक्की कर ली है लेकिन एक आदमी के तौर पर ऐसा लग रहा है कि हम पिछड़ चुके हैं।

हाल के दिनों में ऐसी-ऐसी घटनाएं हुई हैं जो विचलित करती हैं। एक मां अपने कोख से जन्मे बच्चे की हत्या कर देती है। सड़क पर मर चुके शख्स को सैकड़ों गाड़ियां रौंद दे रही हैं। हमें अफसोस तक नहीं हो रहा है। एक दूसरी ऐसी ही घटना गाजियाबाद में हुई है। घने कोहरे के कारण एक गाड़ी की टक्कर से युवक की मौत हो जाती है। लेकिन इसके बाद जो घटना हुई वो हमारी रूह को कंपाने वाली है। रातभर गाड़िया उस मृत शरीर को रौंदती रही। किसी ने भी पुलिस को इस बारे में सूचना तक नहीं दी। मृतक शख्स का शव भी पूरी तरह सड़क से चिपक गया था। हाय रे मानवता! आखिर तुम्हें हो क्या गया है?रातभर अपने सीने के ऊपर से हजारों-लाखों गाड़ियों गुजारने वाली सड़क भी ऐसा देख रोती होगी। क्योंकि खून से लाल होने के बाद उसका जिस्म भी तो भींगता होगा। उसके भी तो आंसू निकलते होंगे, भले ही हम इंसानों की मानवता खत्म हो गई हो।

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