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बीजेपी ने तो बहती गंगा में हाथ धोए, राम मंदिर का ये इतिहास पता होना जरूरी

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नई दिल्ली

राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम को लेकर सारी तैयारी कर ली गई है। 22 जनवरी को अयोध्या में हजारों लोग एकत्रित होने वाले हैं। सियासी चेहरों से लेकर फिल्मी सितारों तक, हर कोई अपनी उपस्थिति दर्ज करवाएगा। अब जो राम मंदिर अब बनकर तैयार हो रहा है, इसका इतिहास, इसका संघर्ष कई दशक पुराना है।वर्तमान में ऐसा माहौल जरूर बन रहा है जहां पर ये देखा जा रहा है कि भाजपा ने ही राम मंदिर आंदोलन को लेकर मुख्य भूमिका निभाई। ये बात सच है कि 1989 के बाद से बीजेपी ने अपने संकल्प पत्र में राम मंदिर को प्रमुखता से रखा था। लेकिन ये भी एक सच्चाई है कि भाजपा के आने से कई साल पहले ही इस आंदोलन की अलख जलाई जा चुकी थी।

जानकार बताते हैं कि आजाद भारत में सबसे पहले राम मंदिर का मुद्दा हिंदू महासभा ने उठाया ।था आजादी के सिर्फ 2 साल बाद ही 14 अगस्त 1949 को हिंदू महासभा ने एक प्रस्ताव पास किया। उस प्रस्ताव में स्पष्ट रूप से राम मंदिर निर्माण को लेकर समर्थन जताया गया। बड़ी बात ये रही कि उस समय हिंदू महासभा ने सिर्फ राम मंदिर को लेकर आवाज नहीं उठाई थी, उनकी तरफ से तो काशी में विश्वनाथ मंदिर, मथुरा में श्री कृष्ण मंदिर और अयोध्या में राम मंदिर को लेकर आवाज उठाने का काम किया गया।

इस संघर्ष के तीन दशक बाद विश्व हिंदू परिषद पहली बार राम मंदिर को लेकर सक्रिय हुआ। 7 अप्रैल 1984 को विश्व हिंदू परिषद ने धर्म संसद का आयोजन किया था। दिल्ली के विज्ञान भवन में हुई उस बैठक के दौरान ऐलान किया गया कि अयोध्या में राम मंदिर, मथुरा में श्री कृष्ण मंदिर और वाराणसी में विश्वनाथ मंदिर के पूर्ण निर्माण के लिए आंदोलन चलाया जाएगा। बड़ी बात ये थी कि उस वक्त कांग्रेस के कुछ नेता जरूर दबी आवाज में वीएचपी के उस आंदोलन का समर्थन कर रहे थे, लेकिन बीजेपी की तरफ से समर्थन में एक भी आवाज नहीं उठाई गई। इसका बड़ा कारण ये था कि तब के पार्टी अध्यक्ष पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी गांधी की विचारधारा से ज्यादा प्रेरित थे। वे मानकर चलते थे कि गांधीवादी सोच के जरिए ही भाजपा सत्ता में आ सकती है।

राज्यसभा के पूर्व सांसद और भाजपा नेता बलबीर पुंज ने अपनी एक किताब लॉन्च की थी- Tyrst With Ayodhya। इस किताब में उन्होंने मंदिर आंदोलन को लेकर कई पहलुओं पर रोशनी डाली। उसे किताब में उन्होंने बताया कि 1984 के लोकसभा चुनाव के बाद संघ की तरफ से एक बैठक बुलाई गई थी जिसमें मुरली मनोहर जोशी, के एस सुदर्शन और खुद बलबीर पुंज मौजूद थे। उस मुलाकात में साफ कहा गया कि गांधीवादी विचारधारा के साथ भाजपा सत्ता में नहीं आ सकती है, हिंदुत्व की तरफ रुख करना ही पड़ेगा।

आरएसएस के साथ हुई उस मुलाकात का असर ये रहा कि 1989 में बीजेपी ने अटल बिहारी वाजपेयी की गांधीवादी विचारधारा को पीछे छोड़ते हुए हिंदुत्व की राह पर बढ़ने का फैसला किया। ये पहली बार था जब पार्टी ने मुखर होकर राम मंदिर आंदोलन को अपना समर्थन दिया और उसे तेज करने की बात भी की। बताया जाता है की एलके आडवाणी की अध्यक्षता में ही 1989 में बीजेपी ने राम मंदिर के पक्ष में पहला प्रस्ताव पारित किया था, लेकिन क्योंकि अटल बिहारी वाजपेयी उस प्रकार की राजनीति को लेकर ज्यादा सहज नहीं थे, ऐसे में कुछ समय के लिए वे शांत हो गए थे, वही उनके मित्र जसवंत सिंह भी नाराज बताए गए थे।

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