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अब कोर्ट को भी ठगने लगे हैं अपराधी! जमानत के फर्जीवाड़े से पर्दा उठा तो हैरान रह गया सुप्रीम कोर्ट

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नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने जमानत पर रिहा होने के लिए अदालत को गुमराह करने के मामलों पर संज्ञान लेते हुए निर्देश जारी किया है। देश की सर्वोच्च अदालत ने अधिनस्थ अदालतों (हाई कोर्ट और लोअर कोर्ट) से विशेष सावधानी बरतने को कहा है कि कोई जमानत लेने के लिए दलील देते वक्त गलत तथ्य पेश नहीं करे। उसने कहा कि अगर मुवक्किल कोर्ट को गुमराह करने में सफल रहा तो कानून का दुरुपयोग होगा और इससे अदालती प्रक्रिया पर सवालिया निशान पैदा होगा। सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों को गुमराह होने से बचने के लिए कुछ टिप्स भी दिए। उसने अपने निर्देश में यह भी कहा कि अब से जमानत के हर आवेदन में पूर्व के बेल अप्लीकेशन की जानकारी देनी होगी और यह भी बताना होगा कि आवेदन देने वाले पर किसी दूसरे कोर्ट में कोई केस तो नहीं चल रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में लंबित थी सुनवाई और हाई कोर्ट से ले ली जमानत!
उच्चतम न्यायलय के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस राजीव बिंदल की बेंच ने यह निर्देश उस वक्त जारी किया है जब उसे उड़ीसा उच्च न्यायालय के एक मामले का पता चला। हाई कोर्ट ने एक व्यक्ति को एनडीपीएस एक्ट के तहत जमानत दी थी। कुशा दुरुका नाम के आरोपी की जमानत याचिका हाई कोर्ट से खारिज हुई तो वह सुप्रीम कोर्ट चला गया जहां उसकी याचिका पर सुनवाई होनी थी। तब तक दुरुका ने हाई कोर्ट में दूसरी बार आवेदन कर दिया। इस बार उसे हाई कोर्ट से जमानत मिल गई। यह बात सुप्रीम कोर्ट को पता चली तो साफ हो गया कि आरोपी ने यह छिपाकर कि उसकी याचिका सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, दरअसल हाई कोर्ट को धोखा दिया।

राज्य सरकार के एफिडेविट ने बढ़ाई हैरानी
कुशा दुरुका को उसके साथी गणेश ठाकुर के साथ 3 फरवरी, 2022 को गिरफ्तार किया गया था। उनके पास से 23.8 किलोग्राम गांजा मिला था। दोनों के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट, 1985 की धारा 20(b)(ii)(C) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। उसके बाद जब उसे जमानत नहीं मिली तो वह हाई कोर्ट गया लेकिन उसकी अपील 3 मार्च, 2023 को खारिज कर हो गई। इस आदेश के खिलाफ उसने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित था, तभी पिछले वर्ष अक्टूबर में वह उच्च न्यायालय से जमानत पाने में सफल रहा। सुप्रीम कोर्ट को यह पता चला तो उसने राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी। ओडिशा के कानून मंत्रालय के मुख्य सचिव ने पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट में एक एफिडेविट देकर कहा कि हाई कोर्ट में विरोधी पक्ष के वकील को न तो सुप्रीम कोर्ट में याचिका लंबित होने और न पहले हाई कोर्ट से जमानत आवेदन खारिज होने की ही जानकारी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने दिया निर्देश
इस जानकारी से भौंचक सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘कानूनी नजरिए से और न्यायालय के सामने सर्वथा प्रकट नहीं होने वाले मामले को छिपाना वास्तविकता से धोखा देने के समान होता है। सत्य को छिपाना दरअसल झूठ बोलने के समान होता है… पिछले 40 वर्षों में मानवीय मूल्यों में गिरावट हो गई है और अब व्यक्ति न्यायालय को गुमराह करने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। वो सत्य का सम्मान नहीं करते हैं।’ कोर्ट ने आगे कहा, ‘भविष्य में ऐसा कोई भ्रम पैदा नहीं हो, इसके लिए उचित होगा कि हाई कोर्ट में जमानत के आवेदन के साथ प्रारंभिक जमानत आवेदनों के आदेश का विवरण और पत्रों की कॉपी मुहैया कराना अनिवार्य हो।’ उसने कहा कि याचिकाकर्ता की अपील किसी और अदालत में दायर है या नहीं, इसकी स्पष्ट जानकारी अपने आवेदन पत्र में देनी होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी के तिकड़म की आलोचना जरूर की लेकिन जमानत को रद्द नहीं किया। बजाय इसके, उसे आदेश दिया कि अभियुक्त को 8 सप्ताह के अंदर ओडिशा उच्च न्यायालय से जुड़े मध्यस्थता और सुलह केंद्र में 10 हजार रुपये जमा करनी होगी और सर्वोच्च न्यायालय के सामने इसकी पालना के प्रमाण पत्र जमा करने होंगे।

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