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चीन पर ऐसी क्‍या आफत आई, आखिर क्‍यों भर-भरकर सोना खरीद रहा है?

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नई दिल्‍ली

मिडिल ईस्‍ट में तनाव बढ़ गया है। अमेरिकी ब्याज दरों में कटौती के आसार हैं। इसके चलते पहले से ही सोने को पंख लगे हुए हैं। इंटरनेशनल मार्केट में पहली बार सोने की कीमतों ने 2,300 डॉलर के स्तर को तोड़ दिया है। अब पीली धातु की डिमांड में चीन की अहम भूमिका सामने आई है। पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना (PBC) लगातार 17 महीनों से सोना खरीदकर सबसे आगे रहा है। इससे यह 2023 में सोने का सबसे आक्रामक केंद्रीय बैंक खरीदार बन गया है। यह कदम चीन की रणनीति का हिस्सा है। आखिर वह अपनी गोल्‍ड होल्डिंग को इस कदर क्‍यों बढ़ाने में जुटा है? आइए, यहां इसे समझने की कोश‍िश करते हैं।

कोई आफत देख रहा है चीन?
आर्थिक और राजनीतिक उथल-पुथल के दौरान सोने को पारंपरिक रूप से एक सुरक्षित विकल्‍प के रूप में देखा जाता है। मिडिल ईस्‍ट और यूक्रेन में हाल के संघर्षों और कोविड के बाद महंगाई में बढ़ोतरी ने सोने का आकर्षण बढ़ाया है। सोने में चीन की इस ताबड़तोड़ खरीदारी को करेंसी को सहारा देने के साथ भी जोड़कर देखा जा रहा है। खासकर तब जब युआन और चीनी शेयर बाजार देश की आर्थिक चुनौतियों से दबाव में हैं।

चीन क्यों जुटा रहा है सोना?
अंतरराष्‍ट्रीय व्यापार के लिए डॉलर पर चीन की निर्भरता ने अमेरिकी करेंसी के उतार-चढ़ाव के प्रति उसकी संवेदनशीलता को लेकर चिंता पैदा कर दी है। दुनिया की रिजर्व करेंसी के रूप में डॉलर का दबदबा है। लेकिन, चीन इस पर निर्भरता कम करने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता लाना चाहता है। 2011 के बाद से चीन की डॉलर होल्डिंग्स में काफी कमी आई है। यह ट्रेंड महामारी के बाद तेज हो गया है। सोने की ओर शिफ्ट करना ब्रिक्स देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) के उद्देश्यों के अनुरूप है। वे 2050 तक डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए एक साझा मुद्रा पर विचार कर रहे हैं।

डॉलर के कूटनीतिक फायदे को तहस-नहस करने की योजना
चीन और रूस अमेरिका की काट ढूंढने में लगे हैं। उन्‍हें लगता है कि अमेरिका ने डॉलर को हथियार बनाया है। इसका इस्‍तेमाल प्रतिबंध लगाने और अपने भू-राजनीतिक रुख को बनाए रखने के लिए किया गया है। इसने चीन और रूस में चिंताएं बढ़ा दी हैं। यूक्रेन पर आक्रमण के बाद रूस के खिलाफ प्रतिबंध और स्विफ्ट प्रणाली से रूसी बैंकों को बाहर करना डॉलर की ताकत का उदाहरण है।

चीन को डर है कि उसकी सैन्य महत्वाकांक्षाओं और अमेरिका के साथ चल रहे ट्रेड टेंशन के कारण कहीं उसके खिलाफ भी वैसे ही कदम न उठाए जाएं। इस आशंका ने चीन को अपने भंडार में विविधता लाने के लिए प्रेरित किया है। इस रणनीति में सोना महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

लंबा है चीन का टारगेट
लगभग 18 महीने से लगातार चीन सोने की खरीद में जुटा है। इसके बावजूद चीन का सोने का भंडार अभी भी पीबीसी के कुल भंडार का एक छोटा सा हिस्सा है। यह विकसित देशों में केंद्रीय बैंकों के स्तर से काफी कम है। वर्ल्‍ड गोल्‍ड काउंसिल को उम्मीद है कि चीन के नेतृत्व में केंद्रीय बैंक की खरीदारी कई वर्षों तक जारी रहेगी। वह डायवर्सिफिकेशन के लिए ऐसा करेगा।

हालांकि, कुछ विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि सट्टेबाज सोने की कीमतें बढ़ा सकते हैं। इसका इस्‍तेमाल अलग-अलग उद्योगों में होता है। यह बेशकीमती धातु है। सोना जुटाना चीन का अपनी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने का प्रयास है। इसके जरिये वह अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व वाली मौजूदा ग्‍लोबल वित्तीय व्यवस्था को चुनौती भी देना चाहता है।

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