पटना:
केंद्र में नई सरकार के लिए एनडीए को पूर्ण बहुमत मिल गया है, लेकिन लगातार दो बार से अकेले बहुमत हासिल करने वाली भाजपा इस बार बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गई है। भाजपा को 242 सीटें मिली हैं। एक निर्दलीय ने भी समर्थन दे दिया है। फिर भी भाजपा बहुमत के आंकड़े में 30 सीटों से पीछे छूट गई है। यानी एनडीए की सरकार तो बन जाएगी, लेकिन बहुमत के लिए उसे सहयोगी दलों पर निर्भर रहना पड़ेगा। भाजपा के प्रमुख सहयोगी दलों में 16 सीटों पर जीत हासिल करने वाली चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी (टीडी), 12 सीटों पर जीतने वाली नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू और चिराग पासवान के नेतृत्व में पांच सीटें जीतने वाली लोजपा (आर) प्रमुख हैं। इन तीन पार्टियों के सांसदों की संख्या 33 होती है, जो एनडीए को मिली 292 सीटों में शामिल है। किन्हीं वजहों से अगर इन दलों में जेडीयू या टीडीपी ने मुंह मोड़ लिया या नरेंद्र मोदी के फैसलों पर साथ नहीं दिया तो यह खतरनाक स्थिति होगी। तब सरकार का चलना भी मुश्किल होगा। हालांकि तीनों दलों ने भाजपा को सरकार बनाने के लिए फिलवक्त सहमति पत्र सौंप दिए हैं। इससे एक बात तो साफ हो गई है कि केंद्र में फिर एनडीए की सरकार बनने जा रही है और नरेंद्र मोदी तीसरी बार रविवार (9 जून 2024) को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेंगे।
एनडीए के सहयोगियों पर संशय क्यों
भाजपा के कुछ सहयोगी दलों ने पहले ऐसी स्थितियां उत्पन्न की हैं, जिससे एनडीए की सरकार बनने में ही संदेह दिख रहा था। खासकर जेडीयू की ओर से, जिसने कई बार भाजपा से मुंह मोड़ा और बाद में रिश्ता जोड़ा है। पर, भाजपा को उसका समर्थन पत्र मिल जाने के बाद यह आशंका तात्कालिक तौर पर निर्मूल हो गई है। पर अतीत के अनुभव खतरा बने रहने का संकेत देते हैं। जिस तरह चंद्रबाबू नायडू ने 2018 में एनडीए से समर्थन वापस लेकर विपक्षी एकता की मुहिम चलाई थी। ठीक ऐसा ही नीतीश कुमार ने 2023 में केंद्र की सत्ता बदलने के लिए विपक्षी एकता का अभियान चलाया था। चंद्रबाबू नायडू जिस तरह विपक्षी एकता की मुहिम में 2019 में नाकाम हो गए थे, वही हाल बिहार के सीएम नीतीश कुमार का रहा। विपक्षी गठबंधन में अपनी उपेक्षा से आहत होकर नीतीश कुमार किनारे हो गए थे और भाजपा से दोस्ती गांठ ली थी। इससे उन्हें दो तात्कालिक लाभ हुए। अव्वल तो बिहार में सीएम की उनकी कुर्सी बरकरार रही और दूसरे उन्हें लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उतनी सीटें आसानी से दे दीं, जितनी पर 2019 में उनके उम्मीदवार जीते थे। 2019 में जेडीयू और भाजपा ने बिहार में 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ा था। भाजपा अपनी सभी 17 सीटें जीत गईं, लेकिन जेडीयू को एक सीट गंवानी पड़ी।
इंडिया ब्लॉक की उम्मीदों पर फिरा पानी
विपक्ष को उम्मीद थी कि नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू पहले विपक्षी एकता का अभियान चला चुके हैं, इसलिए वे इस बार थोड़े प्रयास के बाद साथ आ सकते हैं। विपक्षी नेताओं ने इसकी कोशिश भी की। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार शरद पवार ने नीतीश कुमार से इस बाबत बात की तो चंद्रबाबू नायडू से तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने। पर, दोनों का व्यक्तिगत प्रयास विफल रहा। एनडीए की बैठक में नायडू और नीतीश कुमार न सिर्फ शामिल हुए, बल्कि दोनों ने अपना समर्थन पत्र भी नरेंद्र मोदी को सौंप दिया।
नीतीश की आवाजाही से बढ़ा था संदेह
नीतीश कुमार के पार्टी बदलने, नई पार्टी बनाने और भाजपा-आरजेडी के साथ कई बार की आवाजाही से यह भय बना हुआ था कि शायद वे मौके का फायदा उठा कर विपक्ष की ओर मुखातिब हो जाएं। पहली बार नीतीश कुमार 1994 में लालू यादव के नेतृत्व वाले जनता दल से अलग हो गए थे। उसी साल उन्होंने जॉर्ज फर्नांडीस के साथ मिलकर समता पार्टी का गठन किया। नीतीश कुमार की भाजपा से दोस्ती की शुरुआत पहली बार 1998 में हुई। वर्ष 2003 में नीतीश ने समता पार्टी का नाम जेडीयू कर दिया। भाजपा से उनका रिश्ता कायम रहा और 2005 में जेडीयू-भाजपा ने बिहार में सरकार बना ली। यह रिश्ता 2013 तक बरकरार रहा। भारतीय जनता पार्टी ने 2013 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए पीएम फेस प्रोजेक्ट किया तो नीतीश कुमार नाराज हो गए। उन्हें नरेंद्र मोदी का चेहरा उपयुक्त नहीं लगा। गुजरात दंगों की वजह से नीतीश कुमार को उनसे चिढ़ थी। नीतीश ने भाजपा से कुट्टी कर ली और 2014 का लोकसभा चुनाव अकेले लड़े। उनकी पार्टी जेडीयू को सिर्फ दो सीटों पर जीत हासिल हुई।
नरेंद्र मोदी से नाराजगी जाहिर करने के और भी कई मौके आए। एक बार तो उन्होंने नरेंद्र मोदी की वजह से भाजपा नेताओं के लिए दिया भोज भी ऐन वक्त पर रद्द कर दिया था। इतना ही नहीं, मोदी से नीतीश की खुन्नस इतनी अधिक थी कि बाढ़ की विभीषिका झेल रहे बिहार को नरेंद्र मोदी ने राहत राशि का चेक भेजा तो नीतीश ने उसे स्वीकार नहीं किया था। बहरहाल, वर्ष 2015 में नीतीश ने नया राजनीतिक समीकरण बनाया। आरजेडी और कांग्रेस के साथ वे विधानसभा के चुनाव में उतरे। उन्हें इसमें भी कामयाबी मिल गई और उनकी सीएम की कुर्सी बरकरार रही। पर, यह रिश्ता लंबे वक्त तक टिक नहीं पाया। 2017 में उन्होंने आरजेडी से रिश्ता तोड़ लिया और परखे-पुराने साथी यानी भाजपा से गठबंधन कर सरकार बना ली।
इस रिश्ते में फिर 2022 में दरार आ गई। इन्होंने भाजपा से गठबंधन तोड़कर आरजेडी से मिल कर सरकार बना ली। उसके बाद वे विपक्षी एकता की अवधारणा पर काम करने लगे। उनकी पहल पर विपक्षी दलों की पहली बैठक पटना में हुई, लेकिन पहले दिन से विपक्षी गठबंधन में उनकी उपेक्षा होने लगी। आखिरकार विपक्षी एकता की मुहिम से उनका मन भर गया और 2024 के आरंभ में वे राजद का साथ छोड़ कर भाजपा संग आ गए। तब से वे भाजपा के नेतृत्व में बने एनडीए का हिस्सा हैं। अब तो उन्हें नरेंद्र मोदी के साथ मंच साझा करने से भी गुरेज नहीं है।
समर्थन तो मिला, पर खतरा टला नहीं
नरेंद्र मोदी को टीडीपी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने सरकार बनाने के लिए समर्थन पत्र सौंप तो दिए हैं, लेकिन पहले की तरह मोदी को सरकार चलाने में दिक्कत जरूर आएगी। इसकी मूल वजह यह है कि भाजपा के कई कोर एंजेंडों से नीतीश कुमार की असहमति रही है। वे सीएए, एनआरसी, यूसीसी और विनिवेश के खिलाफ रहे हैं। इसलिए अब इन फैसलों पर भाजपा शायद ही अमल कर पाए। दूसरा, भाजपा को नीतीश और नायडू के अतीत को देखते हुए हमेशा यह खतरा बना रहेगा कि वे कब बिदक कर किनारे हो जाएं। नरेंद्र मोदी ने भी पिछले दो कार्यकाल में भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलने के कारण सहयोगी दलों को तवज्जो नहीं दी। सहयोगी दलों की मंत्रिमंडल में सिर्फ सांकेतिक मौजूदगी रही। पिछली बार नीतीश कुमार इसी बात से नाराज हो गए थे।
भाजपा ने इस बार सहयोगी दलों को चुनाव घोषणा पत्र भी जारी नहीं करने दिया। एनडीए की बजाय वे भाजपा का राग अलापते रहे। यह पहला मौका है, जब मोदी के मुंह से भाजपा के बजाय सिर्फ एनडीए ही निकल रहा है। इतना ही नहीं, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने छोटे दलों के अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिया था। इससे भी सहयोगी दलों के मन में कहीं न कहीं गांठ जरूर होंगी। यह तो नीतीश कुमार की भलमनसाहत है कि वे न सिर्फ नरेंद्र मोदी का साथ दे रहे हैं, बल्कि महीने भर में उनके चरण स्पर्श की दो बार कोशिश की भी की। पर, कड़वा सच यह है कि एनडीए में रहते भाजपा ने अरुणाचल प्रदेश में जेडीयू के छह विधायकों को तोड़ लिया था। चिराग पासवान के चाचा ने जब उन्हें धोखा दिया तो मंत्री पद से भी चिराग को वंचित कर दिया गया और लाख मिन्नतों के बावजूद उनके पिता को आवंटित सरकारी बंगला सरकार ने छीन लिया था। सहयोगियों की शिकायतें और भी हो सकती हैं, जो कभी उभार ले लें तो सरकार पर संकट आ जाएगा।
