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Tuesday, April 28, 2026
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बेहद खराब प्रदर्शन के बावजूद, यूपी विधानसभा उपचुनाव में सबकी निगाहें मायावती पर

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लखनऊ

बसपा अपने अब तक के सबसे खराब दौर में है। पिछले विधानसभा चुनाव और में वह मात्र एक सीट जीत सकी और लोकसभा चुनाव में शून्य पर पहुंच गई। फिर भी हमेशा की तरह आने वाले विधानसभा उपचुनाव में भी सबकी निगाहें बसपा पर हैं। क्या बसपा आने वाला उपचुनाव लड़ेगी? उसे चुनाव लड़ने से वह कितनी मजबूती मिलेगी या फिर उसकी मजबूरी है ? यदि चुनाव लड़ती है, तो उसका क्या असर होगा? किसके समीकरण बनाएगी या बिगाड़ेगी?

बसपा का प्रदर्शन 2012 के बाद से लगातार गिरता जा रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में उसे एक सीट मिली थी और वोट प्रतिशत महज 12.8 प्रतिशत रह गया था। इस लोकसभा चुनाव में वह एक भी सीट नहीं जीत सकी। वोट प्रतिशत गिरकर 9.19 प्रतिशत रह गया। लगातार खराब प्रदर्शन के बावजूद हर चुनाव में बसपा की खूब चर्चा होती है। पिछले लोकसभा चुनाव में भी बसपा के प्रत्याशियों पर सबकी निगाहें रहीं। अब 10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होना है। उससे पहले ही बसपा को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। सबकी निगाहें मायावती की 23 जून को होने वाली बैठक पर लगी हैं। सब जानना चाहते हैं कि वह उपचुनाव को लेकर क्या निर्णय लेती हैं?

प्रत्याशी उतारने को मांगा फीडबैक
सामान्य तौर पर बसपा उपचुनाव से दूरी बनाती रही है, लेकिन पिछले कुछ उपचुनाव में उसने प्रत्याशी उतारे हैं। लोकसभा चुनाव के साथ चार विधानसभा सीटों के लिए हुए विधानसभा उपचुनाव में उसने प्रत्याशी उतारे थे। पार्टी सूत्रों का कहना है कि आने वाले समय में 10 सीटों पर होने वाले विधानसभा उपचुनाव में भी बसपा प्रत्याशी उतारने की तैयारी कर रही है। इसके लिए मायावती ने सभी जिलाध्यक्षों से फीडबैक मांगा है। साथ ही यह भी कहा है कि मजबूत प्रत्याशी भी तलाशें। हालांकि, इसका खुलासा 23 जून को होने वाली बसपा की राष्ट्रीय स्तर की बैठक में होगा।

कितनी मजबूत, कितनी मजबूरी?
दरअसल, बसपा जब तक मजबूत रही, तब तक उपचुनाव नहीं लड़ती थी। लोकसभा चुनाव 2019 के बाद उसने कुछ उपचुनाव लड़े हैं। इसकी वजह ये है कि 2019 तक उसके अपने परम्परागत वोट बैंक में गिरावट को खतरा नहीं था। उसके बाद यह बात आने लगी कि उसका कैडर वोट भी खिसक रहा है। विधानसभा चुनाव 2022 में वोट प्रतिशत 13 प्रतिशत से भी नीचे चला जाना उसके लिए सबसे बड़ी खतरे की घंटी की तरह था। उसके बाद इस लोकसभा चुनाव में 9.19 प्रतिशत आ जाना और बड़ा खतरा है। यही वजह है कि बसपा को लगता है कि यदि वह चुनाव नहीं लड़ती तो उसका वोट कैडर वोट किसी और पार्टी में शिफ्ट हो जाएगा। पहले भाजपा, फिर INDIA ने उसके कैडर वोट में सेंध लगाई। अब एक और खतरा आजाद समाज पार्टी भी है। इस लोकसभा चुनाव में बसपा को एक भी सीट नहीं मिली और चंद्रशेखर ने बड़े अंतर से एक सीट जीत ली। चंद्रशेखर ने उपचुनाव में प्रत्याशी उतारने की बात कही है। ऐसे में खतरा यह भी है कि दलित वोट कहीं उधर न शिफ्ट हो जाए। दलित वोट को बचाए रखने के लिए उपचुनाव लड़ना उसकी मजबूती के लिए जरूरी भी है और मजबूरी भी है।

क्यों है बसपा पर निगाह?
बसपा कितने भी खराब दौर में पहुंच गई हो, लेकिन अब भी इतने वोट उसके पास हैं कि वह किसी के भी समीकरण बना या बिगाड़ सकती है। इस लोकसभा चुनाव में वह ज्यादातर सीटों पर तीसरे नंबर की पार्टी रही है। उसके प्रत्याशियों को 25 हजार से लेकर दो लाख तक वोट मिले हैं। उपचुनाव में इतने वोट समीकरण बनाने या बिगाड़ने के लिए काफी हैं। यही वजह है कि उपचुनाव को लेकर बसपा चर्चा में बनी हुई है।

इन दस सीटों पर होगा उपचुनाव
करहल (मैनपुरी), कटेहरी (अम्बेडकर नगर), मिल्कीपुर (अयोध्या), कुंदरकी (मुरादाबाद), खैर (अलीगढ़), गाजियाबाद सदर (गाजियाबाद), फूलपुर (प्रयागराज), मीरापुर (मुजफ्फर नगर) , मझवा (मिर्जापुर), सीसामऊ (कानपुर)।

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