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राहुल गांधी का नेता प्रतिपक्ष बनना मोदी सरकार के लिए नीतीश–नायडू जैसी ही नई चुनौती है

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नई दिल्ली,

महज दो दिन बीते हैं, और संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने ही अपना अपना अंदाज और तेवर दिखा दिये हैं – और ये कदम कदम पर देखने को मिला है, लोकसभा स्पीकर का चुनाव से लेकर संविधान पर तकरार तक. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस INDIA गठबंधन का अघोषित रूप से अगुवाई कर रही थी, और अब नेता प्रतिपक्ष का नेता बनकर राहुल गांधी संसद में विपक्षी दलों का नेतृत्व कर रहे हैं – और स्पीकर का चुनाव सत्ता पक्ष से दो-दो हाथ करने से पहले आपसी जोर आजमाइश का भी जरिया बना है.

ये तो तय था कि स्पीकर एनडीए का ही बनेगा, लेकिन विपक्ष को भी अपनी मौजूदगी दर्ज करानी थी. ऐसे तो नहीं जाने देंगे. लगे हाथ ये भी पता लगाने की कोशिश रही कि विपक्षी गठबंधन अभी ही लुढ़क तो नहीं गया. नतीजा जो होना था, वही हुआ – बीजेपी और एनडीए के ओम बिरला फिर से लोकसभा के स्पीकर बन गये हैं.

ओम बिरला के अध्यक्ष बनने पर राहुल गांधी और अखिलेश यादव सहित विपक्ष के नेताओं ने स्वागत और बधाई देने के साथ साथ ताने भी कसे, लेकिन पहले ही संबोधन में स्पीकर ने पचास साल पहले देश में लागू इमरजेंसी की निंदा करके हिसाब बराबर कर दिया.

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने कहा, ‘यह सदन 1975 में आपातकाल लगाने के फैसले की कड़ी निंदा करता है… साथ ही हम उन सभी लोगों के दृढ़ संकल्प की सराहना करते हैं, जिन्होंने आपातकाल का विरोध किया… संघर्ष किया, और भारत के लोकतंत्र की रक्षा का दायित्व निभाया.’

सत्ता में आने पर बीजेपी के संविधान बदल देने के मुद्दे पर मिले जनादेश पर इतरा रहा विपक्ष सत्ता पक्ष के इस दांव से सकते में आ गया, और शोर मचाने के अलावा कोई चारा भी न बचा था. स्पीकर ओम बिरला ने इमरजेंसी को लोकतंत्र के इतिहास का काला अध्याय बताया, और कांग्रेस की इंदिरा गांधी सरकार को घेरते हुए सदन में दो मिनट का मौन भी रखवा दिया.

ये नजारा बता रहा है कि आगे भी संसद ऐसे ही चलने वाली है. हालांकि, दोनों तक एक जैसी ही चुनौती है. विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों के लिए सहयोगी दलों को साथ रखना सबसे मुश्किल चैलेंज है.

राहुल गांधी, नायडू और नीतीश जैसा क्यों?
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार – बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के प्रमुख सहयोगी दल हैं, और देखा जाये तो सरकार पर अंकुश रखने के लिए चाबुक भी उनके ही हाथों में है.बीते दस साल की तरह आगे के पांच साल बिलकुल वैसे ही तो नहीं ही रहने वाले हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके कैबिनेट साथियों के लिए अब कुछ भी कर पाना पहले जैसा आसान नहीं होगा.

नई सरकार का कोई भी बड़ा फैसला नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू की सहमति से ही हो पाएगा. ये भी करीब करीब वैसे ही होगा, जैसे एनडीए के सहयोगी दलों के दबाव में वाजपेयी-आडवाणी वाली बीजेपी राम मंदिर के एजेंडे पर पीछे हटकर बीच का रास्ता अपनाती थी, और जिस अंदाज में बीजेपी नेताओं के भाषण हुआ करते थे, बीजेपी का चुनाव घोषणा पत्र वैसा बिलकुल नहीं होता था.

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का रोल ठीक नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू जैसा तो नहीं होगा, लेकिन चैलेंज मिलता जुलता ही रहेगा. हां, राहुल गांधी और नीतीश-नायडू के एक्ट में एक बुनियादी फर्क ये होगा कि नीतीश और नायडू की भूमिका हमेशा ही सहयोगी होगी, जबकि राहुल गांधी की भूमिका बात बात पर विरोध जताने वाली ही होगी – और ये उनका हक भी है.

जब कभी भी नंबर की बात होगी, नीतीश-नायडू की बदौलत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही भारी पड़ेंगे, लेकिन राहुल गांधी विरोध की आवाज जरूर बने रहेंगे, हासिल चाहे कुछ भी न हो – और लोकसभा स्पीकर का चुनाव इसकी बेहतरीन मिसाल है.

और आक्रामक होंगे राहुल गांधी
हो सकता है राहुल गांधी का और भी ज्यादा आक्रामक रुख देखने को मिले, और ये भी हो सकता है कि राहुल गांधी बहुत बदले बदले नजर आयें – क्योंकि संसद और सड़क पर भाषण देने का तरीका बिलकुल अलग होता है. स्पीकर के चुनाव के बाद राहुल गांधी ने जो कुछ भी बोला वो बिलकुल एक आदर्श भाषण कहा जाएगा, लेकिन आगे भी ऐसा ही होगा, सोचा भी नहीं जा सकता – आने वाले दिनों में राहुल गांधी ज्यादा आक्रामक नजर आ सकते हैं.

ओम बिरला की नई पारी का स्वाकत करते हुए विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा, ‘मैं आपको पूरे विपक्ष और इंडिया ब्लॉक की ओर से बधाई देना चाहता हूं… ये सदन देश लोगों की आवाज का प्रतिनिधित्व करता है, और आप उस आवाज के अंतिम निर्णायक हैं… सरकार के पास राजनीतिक ताकत है, लेकिन विपक्ष भी भारत के लोगों की आवाज का ही प्रतिनिधित्व करता है… और इस बार विपक्ष ने पिछली बार की तुलना में लोगों की आवाज का काफी ज्यादा प्रतिनिधित्व पाया है.’

राहुल गांधी ने वादा किया, विपक्ष आपके काम करने में आपकी सहायता करना चाहेगा… हम चाहते हैं कि सदन अक्सर और अच्छी तरह से काम करे… ये बहुत महत्वपूर्ण है कि सहयोग विश्वास के आधार पर हो… ये भी अहम है कि विपक्ष की आवाज को इस सदन में प्रतिनिधित्व करने की अनुमति दी जाये.

ये तो अभी से ही साफ साफ नजर आ रहा है कि विपक्ष का तेवर आगे कैसा रहने वाला है. नंबर गेम में पहले से ही तय था कि एनडीए का ही स्पीकर बनेगा, लेकिन चुनाव की नौबत लाकर विपक्ष ने अपनी मजबूत हाजिरी लगाने की कोशिश की – और हाथ में संविधान की कॉपी लिये संसद पहुंचे, लेकिन इमरजेंसी की निंदा और विरोध में दो मिनट का मौन मोदी और उनके साथियों ने भी बता और जता दिया है कि सब कुछ पहले जैसा ही है, न कुछ बदला है, न बदलेगा.

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