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भारत के भविष्य की झलक है वायनाड जैसी आपदा! मौसम पर WMO की यह चेतावनी डराती है

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नई दिल्ली

देश पर जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का खतरा तेजी से बढ़ता जा रहा है। इसी के मद्देनजर विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) की महासचिव सेलेस्टे सॉलो ने कहा है कि भारत को अपने मौसम विज्ञान के बुनियादी ढांचे में सुधार और विभिन्न खतरों को लेकर मजबूत अर्ली वॉर्निंग सिस्टम को अपनाना होगा। अजरबैजान के बाकू में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन (COP29) में उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से होने वाले नुकसान से बचने के लिए भारत को यह करना ही होगा। सॉलो ने विश्व मौसम विज्ञान संगठन की ‘स्टेट ऑफ द क्लाइमेट 2024’ रिपोर्ट के संदर्भ में यह बात कही। रिपोर्ट में चिंता जताई गई है कि वर्ष 2024 अब तक का सबसे गर्म वर्ष रहने की ओर अग्रसर है।

सबसे अधिक गर्म वर्ष बनने जा रहा 2024!
इस साल जनवरी से सितंबर तक वैश्विक औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 1.54 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा है। हालांकि, दशकों से चल रहे दीर्घकालिक उपायों के बावजूद यह वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे बनी हुई है। सॉलो ने कहा कि डब्ल्यूएमओ भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के साथ मिलकर काम करता है। आईएमडी के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र डब्ल्यूएमओ के तीन उपाध्यक्षों में से एक हैं।

उन्होंने कहा, ‘भारत बहुत सक्रिय है और मौसम संबंधी सेवाओं को बढ़ाने के लिए अच्छे निवेश कर रहा है। लेकिन, इतना बड़ा देश होने के कारण भारत में सुधार की बहुत गुंजाइश है। खासकर मौसम सेवाओं को वेल्यू चेन में लाने में वक्त लगेगा। मौसम विभाग और कृषि, स्वास्थ्य एवं आपदा प्रबंधन जैसे अन्य मंत्रालयों के बीच सक्रिय जुड़ाव महत्वपूर्ण है।’

चुस्त-दुरुस्त रहने की जरूरत
सॉलो ने कहा कि डब्ल्यूएमओ मार्च में एक और विस्तृत रिपोर्ट जारी करेगा, जिसमें समुद्र के स्तर में वृद्धि के कारण क्षेत्रवार प्रभावों पर ध्यान दिया जाएगा। वायनाड भूस्खलन जैसी घटनाओं के बारे में पूछे जाने पर डब्ल्यूएमओ चीफ ने कहा कि यही वह जगह है जहां मल्टि हैजर्ड वॉर्निंग सिस्टम काम आएगा। सॉलो ने कहा, ‘एक ही समय में कई चीजें हो रही हैं। हमें समग्र तरीके से विश्लेषण और प्रतिक्रिया करने की आवश्यकता है। हमें मौसम सेवाओं की आवश्यकता है और साथ ही, अन्य एजेंसियों को मिलकर काम करने और जोखिमों को समझने की आवश्यकता है।’ वायनाड भूस्खलन में 400 से अधिक लोग मारे गए थे। उन्होंने कहा, ‘भारत को भी समुद्र के स्तर में वृद्धि के खतरे का सामना करना पड़ रहा है। इसकी लंबी तटरेखा और तटों के पास घनी आबादी के साथ खतरा हमारे सामने है।

ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ता प्रकोप
डब्ल्यूएमओ की रिपोर्ट जोर देकर कहती है कि 2014-2023 तक वैश्विक समुद्र स्तर में प्रति वर्ष 4.77 मिमी की दर से वृद्धि हुई है, जो 1993 और 2002 के बीच की दर से दोगुनी से अधिक है। अल नीनो इफेक्ट के कारण 2023 में यह और भी तेजी से बढ़ा। 2024 के प्रारंभिक आंकड़ों से पता चलता है कि अल नीनो के कम होने के साथ यह 2014 से 2022 तक बढ़ते रुझान के अनुरूप स्तरों पर वापस आ गया है। वायुमंडल में लगातार बढ़ते ग्रीनहाउस गैस स्तरों के कारण एक ही पीढ़ी में जलवायु परिवर्तन की गति अभूतपूर्व है। 2015-2024 रिकॉर्ड पर अब तक का सबसे गर्म दशक होगा। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा, ‘जलवायु के कारण हो रही तबाही स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है, असमानताओं को बढ़ा रही है, सतत विकास को नुकसान पहुंचा रही है और शांति की नींव को हिला रही है। सबसे कमजोर लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।’

आपदाओं में दिख रही है भविष्य की झलक
हालांकि, डब्ल्यूएमओ चीफ ने कहा, ‘दैनिक, मासिक और वार्षिक समय सारिणी पर दर्ज वैश्विक तापमान विसंगतियों में बड़े बदलाव देखे जा रहे हैं, आंशिक रूप से अल नीनो और ला नीना जैसी प्राकृतिक घटनाओं के कारण। उन्हें पेरिस समझौते में निर्धारित दीर्घकालिक तापमान लक्ष्य के बराबर नहीं माना जाना चाहिए, जो दशकों से औसत के रूप में कायम वैश्विक तापमान स्तरों को संदर्भित करता है।’

उन्होंने कहा, ‘…यह पहचानना आवश्यक है कि तापमान की डिग्री का प्रत्येक अंश मायने रखता है। चाहे वह 1.5 डिग्री सेल्सियस वार्मिंग के स्तर से नीचे हो या ऊपर, ग्लोबल वार्मिंग की प्रत्येक अतिरिक्त वृद्धि जलवायु की चरम सीमाओं, प्रभावों और जोखिमों को बढ़ाती है।’ उन्होंने आगे कहा, ‘इस साल दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हमने जो रिकॉर्ड तोड़ बारिश और बाढ़, तेजी से तेज होती उष्णकटिबंधीय चक्रवात, घातक गर्मी, लगातार सूखा और भीषण आग देखी है, वह दुर्भाग्य से हमारी नई वास्तविकता है और हमारे भविष्य का पूर्वाभास है।’

2024 में भारत में चरम मौसम की घटनाएं
➤ वर्ष के पहले नौ महीनों में भारत ने 93% दिनों में चरम मौसम की घटनाओं का अनुभव किया।
➤ इन मौसमी घटनाओं ने 3,238 लोगों की जान ले ली और 32 लाख हेक्टेयर फसल क्षेत्र को प्रभावित किया।
➤ 36 में से 35 भारतीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने चरम मौसम की घटनाओं का अनुभव किया।
➤ पंजाब और हरियाणा सबसे अधिक प्रभावित हुए क्योंकि उन्होंने 34 दिनों तक चरम मौसम की घटनाओं का अनुभव किया।
➤ उनके बाद उत्तर प्रदेश और राजस्थान का स्थान रहा जिन्होंने क्रमशः 27 और 26 दिनों तक चरम मौसम की घटनाओं का अनुभव किया।

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