18.5 C
London
Saturday, June 20, 2026
Homeराजनीतिहरियााणा और महाराष्ट्र की हार ने कर दिया कांग्रेस को कमजोर, क्या...

हरियााणा और महाराष्ट्र की हार ने कर दिया कांग्रेस को कमजोर, क्या तीसरा मोर्चा भी देखने को मिलेगा?

Published on

नई दिल्ली

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने महाराष्ट्र में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया और बढ़त पाई। लेकिन, कुछ महीने बाद ही हुए विधानसभा चुनाव में मिली ऐतिहासिक हार से पार्टी ने सारी बढ़त गंवा दी है और वह फिर से उसी संघर्ष जोन में पहुंच गई है, जहां वह पिछले 10 बरसों से फंसी हुई है। ऐसा जोन, जहां कांग्रेस न सिर्फ अपने सहयोगी और क्षेत्रीय दलों के निशाने पर रहती है बल्कि पार्टी के अंदर गुटबाजी से भी जूझती रहती है। साथ ही, अब पार्टी ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां अगर भविष्य के मद्देनजर उसने ठोस और सख्त फैसले नहीं लिए, तो देश की राजनीति में नया समीकरण भी देखने को मिल सकता है।

कठिन फैसले लेने में देरी
महाराष्ट्र में हार के बाद कांग्रेस के अंदर बेचैनी है। पार्टी के एक नेता ने कहा कि लंबे समय से लंबित मसलों पर फैसला नहीं लेने का बड़ा खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ रहा है। वह मानते हैं कि इससे कार्यकर्ताओं में हताशा बढ़ रही है। उनकी बात वाजिब लगती है। मिसाल देखें, पार्टी 11 साल पहले जिन-जिन राज्यों में जिन समस्याओं से जूझ रही थी, आज 11 साल बाद भी उन्हीं समस्याओं से दो-चार हो रही है। हरियाणा, राजस्थान से लेकर कई दूसरी जगह उसे गुटबाजी के चलते नुकसान उठाना पड़ा। इसके बाद भी नेतृत्व इस मसले पर कोई ठोस फैसला नहीं ले पाया।

तो नेतृत्व से पूछे जाएंगे सवाल
बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में कांग्रेस हाशिये पर पहुंच चुकी है, लेकिन अपनी स्थिति बेहतर करने के लिए उसने कोई गंभीर कोशिश नहीं की। कार्यकर्ता मान रहे थे कि मल्लिकार्जुन खरगे के अध्यक्ष बनने के बाद चीजें साफ होंगी, संगठन के स्तर पर नए चेहरों को मौका मिलेगा और इसका विस्तार भी होगा। लेकिन, बदलाव के नाम पर रस्मअदायगी कर दी गई। पार्टी का एक वर्ग मानता है कि कांग्रेस नेतृत्व ने यथास्थितिवाद को इतना खींच दिया है कि अब अगर बड़ा बदलाव नहीं हुआ तो सीधे उसे ही सख्त सवालों का सामना करना पड़ सकता है।

सीधे मुकाबलों में असफल
BJP के साथ सीधे मुकाबले में ज्यादातर मौकों पर कांग्रेस टिक नहीं पाई। उसकी यह सियासी कमजोरी दूर ही नहीं हो रही। कर्नाटक और हिमाचल विधानसभा चुनावों में जीत और लोकसभा में बेहतर प्रदर्शन के जरिये कांग्रेस ने इस धारणा को दूर करने का प्रयास किया था। हालांकि हरियाणा और अब महाराष्ट्र की हार ने फिर से वही सवाल खड़ा कर दिया है। दोनों जगह कांग्रेस सीधे BJP को चुनौती दे रही थी और दोनों जगह उसे असफलता मिली।

सहयोगी दलों में असंतोष
कांग्रेस के ढुलमुल रवैये और फैसला न लेने की प्रवृत्ति से अब सहयोगी दल भी नाराज हैं। सहयोगी क्षेत्रीय दलों का मानना है कि कांग्रेस फैसले से लेकर तमाम मसलों में न सिर्फ चीजों को उलझा कर रखती है बल्कि अपनी अव्यावहारिक शर्तें थोपती है। एक क्षेत्रीय दल के वरिष्ठ नेता ने कहा कि लोकसभा चुनाव के बाद जो परिस्थिति बनी, उसमें कांग्रेस की बात मानना सियासी मजबूरी बन गई थी। इससे कांग्रेस कुछ अधिक ही आक्रामक हो गई। लेकिन, पहले हरियाणा और अब महाराष्ट्र में हार के बाद क्षेत्रीय दल एक बार फिर कांग्रेस पर दबाव बनाएंगे।

झारखंड और जम्मू-कश्मीर में क्षेत्रीय दलों की बदौलत जीत मिली। वहां कांग्रेस छोटी पार्टनर थी। इसका असर भी दिखा। झारखंड में जीत के बाद हेमंत सोरेन ने संकेत दिया कि सरकार में हिस्सेदारी को लेकर कांग्रेस की हर शर्त मानी जाए, ऐसा जरूरी नहीं है। जम्मू-कश्मीर में उमर अब्दुल्ला ने भी ऐसा ही संकेत दिया। वहीं, बिहार में हो सकता है कि I.N.D.I.A. में RJD भी कांग्रेस को उतनी हिस्सेदारी न दे, जितनी वह मांग करे।

फिर से तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट
क्षेत्रीय दलों का मानना है कि अब कांग्रेस को सिर्फ राष्ट्रीय पार्टी या बड़े भाई का हवाला देकर हिस्सेदारी नहीं मांगनी चाहिए, उसे पहले अपनी वैल्यू स्थापित करनी चाहिए। अगर वह अपनी वैल्यू स्थापित करने की ईमानदार कोशिश करती है, तो शायद हालात सुधरें। अगर कांग्रेस के रवैये में बदलाव नहीं आता, तो यह बात भी सामने आ रही है कि गैर-कांग्रेसी और गैर-BJP दल एकजुट होकर फिर से तीसरे मोर्चे की संभावना को टटोलें। इसका संकेत TMC के उस संदेश से मिलता है, जिसमें पार्टी ने कहा कि वह कांग्रेस के साथ जाने को बहुत इच्छुक नहीं है।

पार्टी ने तर्क दिया कि पश्चिम बंगाल में उसने उपचुनाव में BJP को सभी 6 सीटों पर हराया और उन सभी जगह कांग्रेस ने भी अपने उम्मीदवार खड़े किए थे। अगर तीसरे मोर्चे की कोई संभावना बनती है तो इसमें KCR, नवीन पटनायक जैसे नेता भी सक्रिय हो सकते हैं।

अगले एक साल होने जा रहे अहम
हालांकि कांग्रेस के पास आत्ममंथन करके चीजों को दोबारा पटरी पर लाने के लिए अब भी वक्त है। जनवरी-फरवरी में दिल्ली में विधानसभा चुनाव होंगे, जहां मौजूदा हालात में आम आदमी पार्टी और BJP के बीच सीधा मुकाबला होता दिख रहा है। अभी की सूरत में कांग्रेस उतनी मजबूत ताकत नहीं है। इसके बाद अगले साल के अंत में बिहार में विधानसभा चुनाव होंगे। कांग्रेस वहां RJD की जूनियर पार्टनर के रूप में रहेगी। इसके तुरंत बाद 2026 की शुरुआत में पार्टी असम और केरल में उतरेगी, जहां उसका अपने विरोधियों से सीधा मुकाबला होगा। ऐसे में पार्टी के सामने अगला एक साल मेक या ब्रेक का होगा।

अगर कांग्रेस अनिर्णय के दौर से नहीं निकलती और इन राज्यों में भी कमजोर प्रदर्शन करती है तो निश्चित तौर पर विपक्षी स्पेस में उसका विकल्प खोजने की कोशिश जोर पकड़ेगी। वहीं, अगर पार्टी हालिया हार से सबक लेकर खुद में आमूलचूल बदलाव लाती है, तो फिर एक ताकत के रूप में आगे बढ़ सकेगी।

Latest articles

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से छत्तीसगढ़ योग आयोग के नवनियुक्त अध्यक्ष संजय अग्रवाल की सौजन्य भेंट

रायपुर। रायपुर स्थित मुख्यमंत्री निवास में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से छत्तीसगढ़ योग आयोग...

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस: मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने पदक विजेता योग खिलाड़ियों के साथ किया योगाभ्यास

जयपुर। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस (21 जून) के तहत आयोजित होने वाले कार्यक्रमों की श्रृंखला...

फगवाड़ा में सीएम भगवंत मान का विपक्ष पर हमला, विकास कार्यों के लिए 18.57 करोड़ रुपए की घोषणा

पंजाब। पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने फगवाड़ा में आयोजित 'लोक मिलनी' कार्यक्रम में...

इंदौर में नीट छात्रा ने तीसरी मंजिल से कूदकर की खुदकुशी; तीन बार असफल होने और परीक्षा विवाद से थी डिप्रेशन में, प्रदेश में...

इंदौर। मप्र के इंदौर स्थित भंवरकुआं थाना क्षेत्र में नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट...

More like this

भेल में अत्याधुनिक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग प्रणालियों का उद्घाटन— ईडी ने किया शुभारंभ

भोपाल। भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (भेल) भोपाल के कार्यपालक निदेशक (ईडी) पीके उपाध्याय ने...

एक जिला एक उत्पाद’ नीति से राजस्थान के स्थानीय उत्पादों को मिल रही वैश्विक पहचान

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में राजस्थान सरकार स्थानीय उत्पादों को वैश्विक पहचान दिलाने...

1 अप्रैल से भोपाल में प्रॉपर्टी खरीदना होगा महंगा, 740 लोकेशन पर बढ़ेगी कलेक्टर गाइड लाइन

भोपाल राजधानी भोपाल में 1 अप्रैल से प्रॉपर्टी खरीदना महंगा हो जाएगा। जिले की कुल...