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Saturday, June 20, 2026
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केजरीवाल को दिल्ली में कांग्रेस का साथ छोड़ने में फायदे अधिक नुकसान कम है, 4 बिंदुओं में समझिए

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नई दिल्ली,

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने रविवार को राष्ट्रीय राजधानी में 2025 के विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस के साथ किसी भी गठबंधन से इनकार कर दिया है. हालांकि इसी तरह की बातें कांग्रेस की ओर से भी हों रही हैं. दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष देवेंद्र यादव ने भी एक दिन पहले आम आदमी पार्टी के साथ किसी भी तरह के गठबंधन इनकार करके सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कही थी.पर अब पार्टियों में राज्य इकाइयों का कोई महत्व नहीं रह गया है. सारे फैसले हाईकमान ही तय करते हैं. इसलिए कांग्रेस के दिल्ली प्रेसिडेंट की बातों का कोई महत्व नहीं दिया जा सकता. अरविंद केजरीवाल ने जेल से आने के बाद कांग्रेस को लेकर जिस तरह का जेस्चर दिखाया था उससे यही लगता था कि भविष्य में बीजेपी के लिए मुश्किल हालात पैदा होने वाली है. पर हरियाणा चुनावों में जिस तरह का व्यवहार कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के साथ किया था उसके बाद यह तय हो गया था भविष्य में इसका असर अन्य चुनावों में भी दिखेगा.

1-क्या अरविंद केजरीवाल की प्रेशर पॉलिटिक्स है?
झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के शपथ ग्रहण समारोह में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बीच एक दूसरे को इग्नोर करने की बॉडी लैंग्वेज दिखी थी. उस दिन ही ये समझ में आ रहा था कि फिलहाल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. पर दूरियां इस कदर बढ़ चुकी हैं कि दोनों पार्टियां एक साथ चुनाव भी नहीं लड़ना चाहतीं हैं इसकी उम्मीद नहीं थी. पर राजनीति में इस तरह की बॉडी लैंग्वेज प्रेशर पॉलिटिक्स के लिए भी बनाई जाती है.और अरविंद केजरीवाल इस खेल के माहिर खिलाड़ी है.अरविंद केजरीवाल दिल्ली विधानसभा चुनावों के नोटिफिकेशन तक कांग्रेस पर कई तरह से हमले करेंगे. और फिर एक दिन ये भी खबर आ सकती है कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दिल्ली में मिलकर चुनाव लड़ेंगे.

दरअसल कांग्रेस भी समझती है कि आम आदमी पार्टी के बिना दिल्ली में चुनाव लड़ने का कोई मतलब नहीं है.हरियाणा विधानसभा चुनाव में आप को 1.79 फ़ीसदी वोट मिले थे. वहीं बीजेपी को 39.94 प्रतिशत तो कांग्रेस के खाते में 39.09 प्रतिशत मतदान गया. बीजेपी ने 90 में से 48 सीटें जीतकर सरकार बना ली. वहीं कांग्रेस को 37 सीटों से ही संतुष्ट होना पड़ा और आप का खाता भी नहीं खुला.ये दोनों के लिए एक सबक था. कांग्रेस ने अगर थोड़ा झुकी होती तो आज हरियाणा में उसकी सरकार होती. दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी भी थोड़ा झुकी होती आज हरियाणा में कम से कम 5 से 7 विधायक होते और सरकार में एक दो मंत्रालय मिले होते.अगले चुनावों तक हरियाणा में आम आदमी पार्टी अपना मजबूत आधार बनाने में सफल हुई होती.

2-क्या आम आदमी पार्टी की रणनीति बीजेपी वाली है
अरविंद केजरीवाल का कांग्रेस से किनारा करने के पीछे आम आदमी पार्टी की एक और रणनीति हो सकती है. जिस तरह की रणनीति हरियाणा में बीजेपी ने अपनाई थी वही अरविंद केजरीवाल दिल्ली में करना चाहते हैं. हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी को शासन करते हुए 10 साल हो गए थे. एंटी इंकंबेंसी और जाट वोटों के बीच कई हिस्सेदार हो जाएं इसके लिए भारतीय जनता पार्टी ने जानबूझकर जेजेपी के साथ गठबंधन तोड़ दिया था. पार्टी को पता था कि बीजेपी के जितने विकल्प होंगे उतने एंटी इंकंबेंसी के वोट बंटेंगे. बहुत कुछ ऐसी ही स्थिति आम आदमी पार्टी के साथ भी है. दिल्ली में शासन करते हुए करीब 12 साल हो जाएंगे. दिल्ली में भी एंटी इंकंबेंसी का बहुत जोर है. केजरीवाल की रणनीति यही है कि किसी तरह ये वोट बंट जाएं. अगर कांग्रेस अलग चुनाव लड़ती है तो आम आदमी पार्टी से नाराज वोटर्स कांग्रेस और बीजेपी में बंट जाएंगे. अगर कांग्रेस के साथ गठबंधन होता है आम आदमी पार्टी का तो एंटी इंकंबेंसी वाले सारे वोट बीजेपी को मिल जाएंगे.

3-लोकसभा चुनावों में फायदे से अधिक नुकसान हुआ था
लोकसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. पार्टियां तो मिल गईं थीं पर शायद दिल नहीं मिले थे. इसलिए दोनों ने एक दूसरे के लिए चुनाव प्रचार करने में कोताही दिखाई . दोनों ने एक दूसरे पर आरोप लगाए कि जिन सीटों पर उनकी पार्टी के प्रत्याशी नहीं थे वहां उन पार्टियों ने सहयोग नहीं किया. फिलहाल कांग्रेस 18.91 प्रतिशत वोट मिले और आम आदमी पार्टी 24.17 प्रतिशत वोट लेने में कामयाब हुई.बीजेपी कुल वोट में 54.35 परसेंट वोट लेकर सभी जीतने में कामयाब हुई. शायद यही कारण है कि अरविंद केजरीवाल को कांग्रेस के साथ गठबंधन करने में कोई रुचि नहीं रह गई है. आम आदमी पार्टी को पता है कि अगर कांग्रेस कुछ सीटें जीत भी लेती है तो चुनावों बाद उसके साथ समझौता किया जाता है. क्योंकि कांग्रेस किसी भी कीमत पर बीजेपी के साथ तो जाएगी नहीं.

4-कांग्रेस जल्दी फैसले नहीं लेती
कांग्रेस के साथ नहीं जाने का आम आदमी पार्टी के लिए एक और कारण महत्वपूर्ण है. अरविंद केजरीवाल ने विधानसभा चुनावों की तैयारी अभी से शुरू कर दी है. कुछ सीटों पर उन्होंने उम्मीदवार भी फाइनल कर दिए हैं. जबकि कांग्रेस के साथ सीट शेयरिंग अगर करनी है तो नामांकन के अंतिम दिन तक उसका इंतजार करना पडे़गा. आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता हर गली हर घर तक पहुंचते हैं. देर से सीट मिलने पर वो ठीक से चुनाव प्रचार नहीं कर पाएंगे. इससे बेहतर उनके लिए यही है कि वो अलग चुनाव लड़ें. हरियाणा विधानसभा चुनावों के लिए नामांकन दाखिल करने के कुछ दिनों पहले राहुल गांधी ने अपनी पार्टी से कहा था कि उन्हें आम आदमी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहिए.ठीक उसी तरह कांग्रेस दिल्ली विधानसभा चुनाव में नामांकन दाखिल करने के एक हफ्ते पहले जागेगी. राहुल गांधी कहेंगे कि आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ना चाहिए.और नामांकन वाले दिन तक दोपहर तक सीट शेयरिंग की बात होती रहेगी. यही कारण है कि कांग्रेस गठबंधन कर भी लेती है तो उसका लाभ नहीं उठा पाती है. पर कांग्रेस की इस कमजोरी के चलते अरविंद केजरीवाल अपना नुकसान क्यों उठाएं?

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