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फीमेल भागीदारी पर नहीं, वोट पर है फोकस! BJP-AAP और कांग्रेस ने 13% से भी कम महिलाओं को दिया टिकट

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नई दिल्ली,

दिल्ली विधानसभा चुनाव में महिला वोटरों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां कई प्रमुख योजनाओं का ऐलान कर चुकी हैं. लेकिन राजनीति में महिलाओं को भागीदारी देने के मामले में सभी पार्टियां लगभग एक जैसी स्थिति में हैं. तीनों पार्टियों ने 13 प्रतिशत से भी कम महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया है.

ऐसा महज संयोग लगता है कि तीन मुख्य पार्टियां; आम आदमी पार्टी, बीजेपी और कांग्रेस ने 70 सीटों में बराबर संख्या में महिलाओं उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा है. लेकिन बराबर नंबर का मतलब भागीदारी में बराबरी बिल्कुल नहीं है. तीनों पार्टियों ने ही महज 9-9 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया है जो 13% से भी कम है.

‘महिलाओं के लिए योजनाएं, लेकिन…’
सभी प्रमुख पार्टियां महिलाओं को रिझाने के लिए बड़े-बड़े वादे कर रहे हैं. कोई महीने का 2100 रुपये दे रहा है तो कोई एक कदम बढ़ कर ढाई हजार रुपये देने की बात कर रहा है. चूल्हा-चौका ठीक से चले इसलिए LPG गैस सिलेंडर भी 500 रुपये में देने की बात हो रही है.

इसके अलावा बुजुर्ग महिलाओं को मुफ्त स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ बसों में फ्री यात्रा भी दी जा रही है. बस कुछ नहीं दिया जा रहा है तो वो है भागीदारी. कुल 699 उम्मीदवारों में 96 उम्मीदवार ही महिलाएं हैं. छोटी पार्टियों और निर्दलीय महिला प्रत्याशियों की वजह से कुल उम्मीदवारों में महिलाओं का प्रतिशत लगभग 14% पहुंच पाया है.

कई को राजनीतिक परिवार का मिला लाभ
जिन महिलाओं को टिकट मिला भी है, उनमें से कई सारी उम्मीदवार ऐसी हैं. जिनको अपने राजनीतिक परिवार में होने की वजह से टिकट दिया गया. जैसे उत्तम नगर से आम आदमी पार्टी विधायक नरेश बालियान जेल में है तो उनकी जगह उनकी पत्नी पूजा नरेश बालियान को टिकट दिया गया है.

कुछ ऐसे ही उदाहरण बीजेपी और कांग्रेस में भी हैं, जहां पहले रहे विधायकों और पार्षदों की बेटियों या पत्नियों को टिकट दिया गया है. लेकिन इन सब के बीच दिल्ली की सीएम आतिशी, शिखा राय, अलका लांबा, रेखा गुप्ता, राखी बिड़लान और रागिनी नायक जैसी महिला उम्मीदवार भी हैं. जिन्होंने अपने दम पर राजनीति की सीढ़ियां चढ़ीं. इनमें से कईयों ने छात्र राजनीति में भी झंडा बुलंद किया और अब विधानसभा में महिला सशक्तिकरण का उदाहरण बनने की तरफ आगे बढ़ रहीं हैं.

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