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बोफोर्स घोटाला: राजीव गांधी को बचाने के लिए हुई थी सीक्रेट मीटिंग, नई किताब में खुलासा

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नई दिल्ली

देश के चर्चित मामलों में से एक ‘बोफोर्स घूसकांड’ पर एक नई किताब में सनसनीखेज खुलासा हुआ है। किताब में दावा किया गया है कि 1987 में बोफोर्स घोटाले में राजीव गांधी को बचाने के लिए वरिष्ठ भारतीय नौकरशाहों और बोफोर्स अधिकारियों के बीच गुप्त बैठकें हुईं। खोजी पत्रकार चित्रा सुब्रमण्यम की ओर से लिखी गई इस किताब में स्वीडिश पुलिस प्रमुख स्टेन लिंडस्ट्रोम (किताब में ‘स्टिंग’ के रूप में उल्लिखित) की ओर से दिए गए दस्तावेजों के आधार पर ये दावे किए गए हैं। लिंडस्ट्रोम स्वीडन में बोफोर्स मामले की जांच कर रहे थे। इन बैठकों में कथित तौर पर भ्रष्टाचार को छिपाने और राजीव गांधी को बचाने के तरीके बताए गए।

बोफोर्स घोटाले से जुड़ा बड़ा खुलासा
बोफोर्स घोटाला 1980 के दशक का एक बड़ा राजनीतिक भूचाल था। इसमें स्वीडिश कंपनी बोफोर्स से 1,437 करोड़ रुपये के हॉवित्जर तोप सौदे में 64 करोड़ रुपये की रिश्वत के आरोप लगे थे। यह सौदा भारतीय सेना के लिए 400 तोपों की आपूर्ति के लिए था, जिनका कारगिल युद्ध में महत्वपूर्ण योगदान रहा। इस मामले की सुनवाई 2011 में बंद कर दी गई थी। चित्रा सुब्रमण्यम की किताब ‘बोफोर्सगेट’ में इस घोटाले की गहराई से पड़ताल की गई है।

चित्रा सुब्रमण्यम की किताब में कई दावे
सुब्रमण्यम ने यूरोप से इस मामले को कवर किया था। उनकी किताब 320 पृष्ठों की है और इसमें उनकी जांच के बारे में विस्तार से बताया गया है। किताब के अनुसार, 22 अगस्त 1989 को स्टिंग ने सुब्रमण्यम को स्टॉकहोम में कुछ दस्तावेज दिए। इन दस्तावेजों में बोफोर्स और भारतीय अधिकारियों के बीच हुई बैठकों का 15 पृष्ठों का ‘सहमति से तैयार सारांश’ भी शामिल था। इस सारांश ने ही कथित तौर पर मामले को दबाने का आधार तैयार किया।

भारतीय नौकरशाहों ने की 1987 में बोफोर्स अफसरों संग सीक्रेट मीटिंग
सुब्रमण्यम की किताब इसी महीने की 17 तारीख को बाजार में आ रही है। किताब में लिखा है, ‘यह 15 पृष्ठों का एक सहमति-आधारित सारांश था, जिसमें बताया गया था कि भ्रष्टाचार को कैसे छिपाया जाए। मेरी जांच में प्रगति से कैसे निपटा जाए और सबसे बढ़कर, प्रधानमंत्री राजीव गांधी को सभी दोषों से कैसे मुक्त किया जाए।’ किताब के मुताबिक, ये बैठकें रक्षा मंत्रालय में 15, 16 और 17 सितंबर 1987 को हुई थीं, जो रेडियो पर खुलासे के ठीक पांच महीने बाद की बात है।

राजीव गांधी को बचाने का तरीका सुझाया था- किताब
किताब में इन सीक्रेट मीटिंग का विस्तृत विवरण दिया गया है। बोफोर्स टीम को सरदार पटेल मार्ग पर एक फाइव स्टार होटल में ठहराया गया था। उनके कमरों को बाहरी लोगों की पहुंच से दूर रखा गया था। बोफोर्स टीम का नेतृत्व पेर ओवे मोरबर्ग और लार्स गोहलिन ने किया था। भारतीय टीम में एसके भटनागर, पीके कार्था, गोपी अरोड़ा और एनएन वोहरा जैसे वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। रक्षा मंत्रालय के तत्कालीन संयुक्त सचिव के बनर्जी ने भारतीय टीम की सहायता की।

बैठकों में हुई कई मुद्दों पर बात
बैठकों में बोफोर्स ने कहा कि जब भारत ने ‘नो एजेंट’ नीति लागू की थी, तब उसने सभी अनुबंध समाप्त कर दिए थे। बोफोर्स ने यह भी गारंटी मांगी कि जो जानकारी वह देगा, उसे गोपनीय रखा जाएगा। लेकिन भारत ने कहा कि मीडिया में खुलासे और विरोध प्रदर्शनों के कारण वह ऐसा नहीं कर सकता।

सुब्रमण्यम ने किया एक ट्रेनिंग का जिक्र
सुब्रमण्यम लिखती हैं, ‘इसके बाद प्रशिक्षण शुरू हुआ। भारतीय अधिकारियों ने बोफोर्स टीम को बताया कि जेपीसी (संयुक्त संसदीय समिति) एक संसदीय निकाय है, लेकिन उन्हें (बोफोर्स को) उससे अधिक कुछ भी बताने की आवश्यकता नहीं है, जितना वे आवश्यक समझते हैं। भारतीय प्रतिनिधिमंडल बोफोर्स को जानकारी छिपाने के तरीके सुझा रहा था, जबकि वह अपने लिए विवरण सुरक्षित कर रहा था।’

अरुण नेहरू की भूमिका, अमिताभ बच्चन को लेकर दावा
किताब में कई अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं पर भी प्रकाश डाला गया है। इसमें अरुण नेहरू की भूमिका, अमिताभ बच्चन को फंसाने के कथित प्रयास, स्विट्जरलैंड से जानकारी प्राप्त करने के अनुरोध को कमजोर करने, खबर को दबाने में तत्कालीन पत्रकारों और संपादकों की भूमिका, और एक युवा मां के रूप में सुब्रमण्यम के संघर्षों का भी जिक्र है।

एक बच्चे के साथ चित्रा सुब्रमण्यम ने बताया अपना हाल
सुब्रमण्यम लिखती हैं, ‘जब घोटाला सामने आया तब मेरी शादी के चार साल हुए थे और मैं एक बच्चे की मां थी। मैंने अपने बेटे को दूध की बोतलों, पैम्पर्स और भारत से आने वाले ट्रंक कॉल के बीच पाला। जब मैं अपने करियर की सबसे बड़ी खबर और अपने देश के समकालीन इतिहास के साथ अपने दांपत्य जीवन की जिम्मेदारियों को निभा रही थी तो मेरे दिमाग में कई प्रश्न उठ रहे थे।’

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