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Tuesday, June 2, 2026
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क्यों लेना पड़ा सरकार को जाति जनगणना का फैसला? जानिए क्या है आरएसएस का रुख

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नई दिल्ली

केंद्र सरकार ने जाति जनगणना कराने का फैसला लिया है। इसे लेकर करीब चार-पांच साल से राजनीति गरम थी और 2024 के लोकसभा चुनावों में विपक्ष ने, खासकर कांग्रेस, आरजेडी और समाजवादी पार्टी ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया था। दूसरी तरफ बीजेपी ने इसकी काट में ‘एक है तो सेफ हैं’ , ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ का नारा दिया और लोकसभा चुनाव के बाद हुए सभी चुनावों में इस नारे का इस्तेमाल किया। बीजेपी के सभी टॉप नेताओं ने बार बार इसे दोहराया। अब ऐसा क्या हुआ जो केंद्र सरकार को इसका फैसला लेना पड़ा।

सहयोगियों का भी दबाव और बिहार की चिंता
यह विपक्ष के साथ ही बीजेपी के सहयोगी दलों का भी मुद्दा था। इसकी मांग बीजेपी के सहयोगी दल जेडीयू, एलजेपी (पासवान) भी करते रहे थे। जब बिहार के सीएम नीतीश कुमार महागठबंधन में थे तब उनकी सरकार ने जाति सर्वे कराया था। आरजेडी के तेजस्वी यादव इसका श्रेय लेते रहे हैं। सहयोगियों की मांग पूरी करने के साथ ही बीजेपी ने बिहार विधानसभा चुनाव से पहले विपक्ष के मुद्दे को खत्म कर दिया है। विपक्ष जरूर इसे भुनाएगा कि उनकी मांग पूरी हुई और सरकार को झुकना पड़ा। लेकिन बीजेपी और एनडीए इसका क्रेडिट लेकर अपने फायदे में इस्तेमाल कर सकते हैं।

विपक्ष के कैंपेन से नुकसान
लोकसभा चुनाव में विपक्ष ने यह कैंपेन चलाया था कि बीजेपी आरक्षण खत्म करना चाहती है। इसका बीजेपी को काफी नुकसान भी हुआ, जो बीजेपी नेताओं ने कई मौकों पर माना भी विपक्ष न लोगों को बरगलाया और झूठ फैलाया, जिसका नुकसान हुआ। विपक्ष लगातार जाति जनगणना को आरक्षण से जोड़ कर देख रहा था। यह भी लग रहा था कि जाति जनगणना से बीजेपी का कथित अपर कास्ट वोटबैंक नाराज हो सकता है। बीजेपी ने पिछले कुछ वक्त में दलित और ओबीसी वोटबैंक को बढ़ाने और बचाने की कई कवायद की। जिसके बाद अब यह फैसला लिया गया है।

बिहार के बाद पश्चिम बंगाल और यूपी के भी चुनाव होने हैं। यहां चुनाव में ओबीसी वोटबैंक के बीच यह बड़ा मुद्दा बनता इससे पहले ही केंद्र सरकार ने जाति जनगणना का फैसला कर लिया। बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने जाति जनगणना के फैसले का स्वागत किया और कहा कि हम लोगों की यह पुरानी मांग थी। बीजेपी के नेता भी इसे सामाजिक न्याय से जोड़ रहे हैं और कह रहे हैं कि सामाजित न्याय के लिए यह अहम फैसला है।

संघ का रुख कड़ा नहीं
पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जाति जनगणना को लेकर कड़ा रुख दिख रहा था और संघ के लोगों का मानना था कि इससे सामाजिक खाई बढ़ेगी। संघ वैसे भी हिंदू एकता पर जोर देता रहा है। दिसंबर 2023 में संघ के विदर्भ के सह संघचालक श्रीधर गाडगे ने कहा था कि जाति आधारित जनगणना नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा था कि इस तरह की कवायद से कुछ लोगों को राजनीतिक रूप से फायदा हो सकता है, लेकिन यह सामाजिक रूप से और राष्ट्रीय एकता के संदर्भ में अच्छा नहीं है। हालांकि पिछले साल सितंबर में केरल में संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने कहा कि ‘हमारे हिंदू समाज में जाति बहुत संवेदनशील मुद्दा है।

जनगणना हमारी राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा के लिए अहम है। इसे बहुत गंभीरता के साथ किया जाना चाहिए। समाज में पिछड़े वर्ग की भलाई हेतु जनकल्याणकारी कार्यों के लिए जातिगत जनगणना के डेटा के उपयोग में हमें कोई असहमति नहीं है। हालांकि, सामाजिक विघटन करने अथवा चुनाव में लाभ पाने के स्वार्थ से इसका उपयोग नहीं किया जाना चाहिए’। संघ की तरफ से भी नरम रूख दिखने के बाद केंद्र सरकार ये फैसला लेने के लिए आगे बढ़ी।

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