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19 साल से बंधक मैथ टीचर, भैंस के तबेले में सोता था NTPC कर्मचारी… गुना में कैद से छूटे बंधुआ मजदूरों की Inside Story

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गुना:

पुलिस ने एक बड़े रैकेट का पर्दाफाश किया है। इस रैकेट में लोगों को बंधक बनाकर उनसे जबरन मजदूरी करवाई जाती थी। पुलिस ने 16 लोगों को छुड़ाया है, जिनमें एक टीचर भी शामिल है जो 19 साल से बंधुआ मजदूर बना हुआ था। इन लोगों को अमानवीय परिस्थितियों में रखा जाता था और विरोध करने पर उनके साथ मारपीट की जाती थी। पुलिस ने इस मामले में 11 आरोपियों को गिरफ्तार किया है और एक आरोपी अभी भी फरार है। मामला मानव तस्करी और बंधुआ मजदूरी से जुड़ा हुआ है।

बिना सैलरी के काम कराते थे दबंग
पुलिस और प्रशासन ने मिलकर यह ऑपरेशन चलाया। इस ऑपरेशन में 16 लोगों को बचाया गया। ये लोग बंधुआ मजदूर के तौर पर काम कर रहे थे। इनमें से एक व्यक्ति टीचर था। वह गुजरात के एक स्कूल में गणित और अंग्रेजी पढ़ाता था। उसे 19 साल से एक गांव में बंधुआ मजदूर बनाकर रखा गया था। उससे बिना सैलरी के खेतों और जानवरों के बीच काम करवाया जाता था।

क्या है रहुआ सिस्टम
पीड़ितों को लगभग दो दशकों से बंधक बनाकर रखा गया था। उनसे ‘रहूआ’ नामक एक स्थानीय बंधुआ प्रणाली के तहत शोषण किया जा रहा था। ‘रहूआ’ का मतलब है ‘रहो और खाओ’। उनसे खाना और आश्रय देने का वादा किया जाता था, लेकिन उनसे गुलामी करवाई जाती थी। पीड़ितों ने बताया कि उनसे सुबह से रात तक मवेशियों के बाड़े, खेतों, ईंट भट्टों और सड़क किनारे के भोजनालयों में काम करवाया जाता था। उन्हें केवल बचा हुआ खाना और जानवरों के पास फटे हुए बिस्तर मिलते थे। उनके साथ लगातार मारपीट और दुर्व्यवहार किया जाता था।

बेहद खराब हालत में मिले बंधक
पुलिस, राजस्व और नगरपालिका की टीमों ने मिलकर कई जगहों पर छापेमारी की। इन छापों में इन लोगों को छुड़ाया गया। इन लोगों को बहुत ही खराब हालात में रखा गया था। अगर कोई विरोध करता था तो उसके साथ मारपीट की जाती थी और उसे बिजली के झटके भी दिए जाते थे। इनमें से कई लोग परेशान थे। कुछ बूढ़े थे तो कुछ दिव्यांग थे। उनकी हालत इतनी खराब थी कि कुछ को अपना नाम तक याद नहीं था। कुछ को अपने गांव का नाम भी नहीं पता था। वे इतने डरे हुए थे कि पुलिस के सामने भी कांप रहे थे। पुलिस के अनुसार, इन मजदूरों को उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उड़ीसा, गुजरात और झारखंड जैसे राज्यों से लाया गया था।

एक टीचर जो गोबर उठाने पर मजबूर था
प्रशासन ने बीनागंज इलाके से रामा नाम के एक व्यक्ति को छुड़ाया। रामा ने बताया कि वह गुजरात के रहने वाले हैं। वह अहमदाबाद के मानव चेतना हाई स्कूल में टीचर थे। वह 10वीं कक्षा के छात्रों को अंग्रेजी और गणित पढ़ाते थे। कई साल पहले वह शिरडी से मथुरा पैदल यात्रा पर निकले थे। रास्ते में बीनागंज (चांचौड़ा) में कुछ लोगों ने उन्हें पकड़ लिया। वे उन्हें अपने घर ले गए। उनसे घर और खेतों में गोबर उठवाना, पशुओं की देखभाल करना जैसे काम करवाए गए। रामा ने बताया कि जब वह भागने की कोशिश करते थे तो उन्हें डराया जाता था। उनसे कहा जाता था कि अगर वह बाहर निकलेंगे तो और लोग उन्हें पकड़ लेंगे और फिर वह कभी बाहर नहीं जा पाएंगे। रामा ने कई बार उन लोगों से छोड़ने की विनती की, लेकिन उन्होंने उनकी बात नहीं सुनी।

एनटीपीसी में काम करने वाला युवक भैंसों का गोबर उठाता था
उत्तर प्रदेश के रायबरेली के रहने वाले वीरेंद्र यादव ने बताया कि वह पहले समोसा बनाने का काम करते थे। उन्होंने एनटीपीसी (नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन) में भी काम किया था। काम के सिलसिले में वह मध्य प्रदेश आए थे। एक दिन उनसे कहा गया कि अब उन्हें आगे पैदल ही जाना होगा। बीनागंज इलाके में ‘भूरा’ नाम के एक व्यक्ति ने उन्हें बुलाया और अपने घर ले जाकर बंदी बना लिया। वीरेंद्र ने बताया कि उनसे भैंसों का गोबर उठवाया जाता था। उन्हें चारा डालना, नहलाना जैसे सारे काम करवाए जाते थे। उन्हें कहीं बाहर जाने की इजाजत नहीं थी। हर समय उन पर निगरानी रखी जाती थी। उन्हें भैंसों के साथ तबेले में ही सुलाया जाता था।

कानपुर से गुना पहुंचे युवक को भी बनाया बंधुआ मजदूर
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के विमल कुमार ने बताया कि वह कानपुर से यात्रा कर रहे थे। गुना में उनकी गाड़ी खराब हो गई। उसी दौरान एक व्यक्ति मिला और कहा कि वह उन्हें आगे छोड़ देगा। विमल ने उस पर भरोसा कर लिया और उसके साथ चल दिए। लेकिन वह व्यक्ति उन्हें अपने घर ले गया और जबरन मजदूरी पर लगा दिया। बिट्टू नाम के एक व्यक्ति ने उन्हें पकड़ रखा था। विमल ने बताया कि उन्हें केवल रोटी खाने को दी जाती थी। उन्हें नहाने के लिए साबुन तक नहीं मिलता था। जहां भैंसें बांधी जाती थीं, उसी जगह एक कोने में बिस्तर डालकर उन्हें सुलाया जाता था।

होटल और ढाबों में भी कराई जा रही थी मजदूरी
चांचौड़ा क्षेत्र में मानसिक रूप से कमजोर लोगों को बंधक बनाकर जबरन मजदूरी कराए जाने की शिकायतें लगातार प्रशासन को मिल रही थीं। कलेक्टर ने इस मामले को गंभीरता से लिया। उन्होंने चांचौड़ा एसडीएम रवि मालवीय को कार्रवाई करने के निर्देश दिए। रवि मालवीय ने पांच टीमों का गठन किया। इन टीमों में राजस्व विभाग, पुलिस और नगर पालिका के अधिकारी शामिल थे। टीमों ने अलग-अलग स्थानों पर छापेमारी की।

उन्होंने होटल, ढाबों, खेतों और ईंट भट्टों पर काम करते हुए मजदूरों को छुड़ाया। उनसे घंटों तक लगातार काम करवाया जाता था और बदले में उन्हें केवल खाना खिलाया जाता था। उन्हें न तो सैलरी दी जाती थी और न ही उनके साथ इंसानों जैसा व्यवहार किया जाता था। उनका सिर्फ शोषण किया जाता था। टीमों ने मौके से कुल 16 मजदूरों को रेस्क्यू किया। उन्हें सबसे पहले बीनागंज स्वास्थ्य केंद्र लाया गया। वहां उन्हें प्राथमिक चिकित्सा दी गई। उन्हें खाना खिलाया गया और जरूरत की चीजें दी गईं। फिलहाल सभी पीड़ितों को पुनर्वास के लिए ‘अपना घर’ आश्रम, शिवपुरी भेजा गया है। प्रशासन अब उनकी पहचान करने और उनके पुनर्वास की प्रक्रिया में जुटा है।

कलेक्टर ने अस्पताल पहुंचकर मजदूरों से मुलाकात की
शाम के समय कलेक्टर किशोर कुमार कन्याल जिला अस्पताल पहुंचे। उन्होंने रेस्क्यू किए गए मजदूरों से मुलाकात की। उन्होंने प्रत्येक व्यक्ति के स्वास्थ्य की जानकारी ली और उनके हालात की समीक्षा की। उन्होंने कहा कि पीड़ितों के लिए उचित चिकित्सा, देखभाल और पुनर्वास की व्यवस्था प्रशासन सुनिश्चित करेगा।

सिर्फ जिंदा रहने के लिए देते थे खाना
मजदूरों की जांच करने वाले जिला अस्पताल के डॉ. सोवरन राय ने कहा कि उनसे इतना काम कराया गया है कि उनकी हालत ठीक से बताने लायक नहीं है। उनके स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखा गया। बीमार पड़ने पर उनका इलाज नहीं कराया गया। उन्होंने कहा कि जांच में कुछ लोगों को स्किन, फेफड़ों की परेशानी और कुछ लोगों को सर्जिकल परेशानी सामने आई है। उन्होंने कहा कि इन लोगों को पकड़ने वालों का एक ही उद्देश्य था कि जितना हो सके इनसे काम कराएं और सिर्फ खाना दें, ताकि ये जिंदा रहें।

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