भोपाल
मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में वर्षों से पढ़ा रहे शिक्षकों के लिए ‘शिक्षक पात्रता परीक्षा’ अनिवार्य किए जाने के फैसले ने तूल पकड़ लिया है। संचालक लोक शिक्षण द्वारा जारी इस आदेश के विरोध में शुक्रवार को प्रदेशभर के शिक्षक संगठन सड़कों पर उतर आए। शिक्षकों का आरोप है कि यह आदेश न केवल उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ है, बल्कि कानूनी रूप से भी त्रुटिपूर्ण है। भोपाल कलेक्ट्रेट में प्रदर्शन, मुख्यमंत्री से गुहार राजधानी भोपाल में शासकीय शिक्षक संगठन के जिलाध्यक्ष राजेश साहू के नेतृत्व में बड़ी संख्या में शिक्षकों ने कलेक्टर कार्यालय तक रैली निकाली और जमकर नारेबाजी की। शिक्षकों ने कलेक्टर को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर मांग की कि इस आदेश को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जाए। शिक्षक नेताओं ने तर्क दिया कि अन्य राज्यों की तरह मध्य प्रदेश सरकार को भी इस मुद्दे पर शिक्षकों के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर करनी चाहिए। ‘भर्ती के समय नहीं थी ऐसी कोई शर्त’ संगठन के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष उपेन्द्र कौशल ने कहा कि प्रदेश के अधिकांश शिक्षकों की नियुक्ति शिक्षाकर्मी भर्ती अधिनियम 1997, 1998 और अध्यापक भर्ती अधिनियम 2008 के तहत हुई थी।
इन नियमों में कहीं भी TET उत्तीर्ण करने की शर्त नहीं थी। शिक्षकों का कहना है कि 27 सालों की सेवा के बाद अब परीक्षा की शर्त थोपना न्यायसंगत नहीं है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि लोक शिक्षण संचालनालय ने यह आदेश जारी करने से पहले शासन या मंत्रिमंडल से औपचारिक अनुमति नहीं ली है। जबलपुर में भी फूटा गुस्सा: ‘जनगणना कार्य का करेंगे बहिष्कार’ जबलपुर में भी सैकड़ों शिक्षकों ने घंटाघर पहुंचकर विरोध प्रदर्शन किया और डिप्टी कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा। शिक्षकों ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने अपना दबाव वापस नहीं लिया, तो वे आने वाले समय में जनगणना के कार्यों का पूरी तरह बहिष्कार करेंगे।
