
- सांसद आलोक शर्मा
देश को अंग्रेजों की हुकूमत से आजादी भले ही 15 अगस्त 1947 को मिल गई थी, लेकिन मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल आज अपनी आजादी की 77वीं वर्षगांठ ‘भोपाल गौरव दिवस’ के रूप में मना रहा है। भोपाल की जनता और विशेष रूप से युवा पीढ़ी के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि देश की स्वतंत्रता के पूरे 2 साल बाद, यानी 1 जून 1949 को भोपाल को असली आजादी क्यों और कैसे मिली?
जब 1947 में पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था, तब भोपाल में सन्नाटा पसरा हुआ था। भोपाल की धरती पर तिरंगा फहराने में पूरे 659 दिन का वक्त लगा। स्वतंत्रता के समय देशभर में बिखरी 584 रियासतों में से अधिकांश सरदार वल्लभभाई पटेल के भगीरथी प्रयासों से आजाद भारत का हिस्सा बन चुकी थीं, लेकिन कुछ रियासतें भारत का अंग बनने के बजाय अलग राह तलाश रही थीं।
नवाब का लालच और जनता का विद्रोह
तत्कालीन भोपाल नवाब हमीदुल्लाह खां को पाकिस्तान का गवर्नर जनरल बनाए जाने तक का लालच दिया गया था। वह अंग्रेजों के चाटुकार और स्वतंत्रता आंदोलन के विरोधी देशी रियासतों के संगठन ‘चेंबर ऑफ प्रिंसेस’ के दो बार चांसलर रह चुके थे, जिसके कारण उनका बाकी राजे-रजवाड़ों पर भी गहरा प्रभाव था। नवाब भोपाल को स्वतंत्र रखने या पाकिस्तान में विलय के मंसूबे पाल रहे थे, लेकिन भोपाल की देशभक्त जनता और शिक्षित नवयुवकों को यह कतई स्वीकार नहीं था। उन्होंने भोपाल को भारत का अभिन्न अंग बनाने का दृढ़ संकल्प लिया।
विलीनीकरण आंदोलन के प्रमुख नायक
भोपाल के इस ऐतिहासिक विलीनीकरण आंदोलन का नेतृत्व भाई रतन कुमार गुप्ता ने किया। आंदोलन को सफल बनाने में भोपाल की कई महान विभूतियों ने अपना सर्वस्व झोंक दिया, जिनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
पं. उद्धव दास मेहता
डॉ. शंकर दयाल शर्मा (पूर्व राष्ट्रपति)
मास्टर लाल सिंह
नित्य गोपाल शर्मा, सूरजमल जैन, प्रोफेसर अक्षय कुमार
लक्ष्मी नारायण जैमिनी, प्रेम श्रीवास्तव, बालकृष्ण गुप्ता, जमुना प्रसाद मुखरैया
महिला नेतृत्व: बसंती देवी, शांति देवी, मोहिनी देवी और पुष्पा चारु जैसी साहसी महिलाओं का अविस्मरणीय योगदान रहा।
भूमिगत आंदोलन और दमन: आंदोलन का मुख्य केंद्र जुमेराती स्थित ‘रतन कुटी’ था, जो ‘नई राह’ अखबार का कार्यालय भी था। नवाबी कुशासन ने इसे सील कर दिया, जिसके बाद यह आंदोलन भूमिगत होकर नर्मदापुरम, सीहोर के इछावर और रायसेन से संचालित होने लगा।
बोरास का नरसंहार और वीरों का बलिदान
विलीनीकरण आंदोलन का सबसे संवेदनशील और निर्णायक मोड़ रायसेन जिले के बोरास में आया। वहाँ एक सभा के दौरान जब तिरंगा फहराया जा रहा था, तब नवाबी पुलिस ने निहत्थे आंदोलनकारियों पर अंधाधुंध गोलियां चला दीं। इस क्रूर गोलीकांड में चार देशभक्त शहीद हो गए:
छोटूलाल (मात्र 16 वर्ष की अल्पायु में बलिदान)
धन सिंह
मंगल सिंह
विशाल सिंह
सरदार पटेल की सख्ती और 1 जून को मिली आजादी
जब बोरास के इस नृशंस गोलीकांड की खबर लोहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल तक पहुंची, तो उन्होंने सख्त रुख अपनाते हुए नवाब हमीदुल्लाह खां को अंतिम चेतावनी दी। उन्होंने 24 जनवरी 1949 को अपने सचिव वी.पी. मेनन को भोपाल भेजा। आखिरकार, बलिदानियों के पराक्रम और सरदार पटेल की दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे नवाब को झुकना पड़ा। 1 जून 1949 को भोपाल का औपचारिक रूप से भारत संघ में विलय हुआ और भोपाल पूरी तरह आजाद हुआ।
इस तरह ‘गौरव दिवस’ बना संकल्प
इस ऐतिहासिक दिन को याद करते हुए पूर्व महापौर और वर्तमान जनप्रतिनिधियों के प्रयासों से नगर परिषद ने भोपाल विलीनीकरण दिवस को ‘भोपाल गौरव दिवस’ के रूप में मनाने का संकल्प पारित किया था, जिसकी शुरुआत तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में हुई थी। यह दिवस भोपाल के संघर्ष और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक है।
