नई दिल्ली/भोपाल। अमेरिकी मौसम एजेंसी एनओएए (NOAA) ने प्रशांत महासागर में ‘अल नीनो’ के आधिकारिक तौर पर सक्रिय होने की घोषणा की है, जो जल्द ही ‘सुपर अल नीनो’ का रूप ले सकता है। इस मौसमी बदलाव के तहत समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 3 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ने की आशंका है, जिससे वैश्विक स्तर पर हवाओं का रुख बदलने से मौसम चक्र पूरी तरह उलट-पुलट हो जाता है। इस बड़े खतरे को भांपते हुए केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री ने सभी राज्यों को अलर्ट मोड पर रहने और पहले से तैयारियां पूरी करने के सख्त निर्देश दिए हैं।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) के शुरुआती अनुमानों के मुताबिक, इस प्रभाव के कारण देश में इस बार मानसून सामान्य से 10 फीसदी कम रह सकता है, जबकि देश में सूखे (Drought) की आशंका 60 फीसदी तक बढ़ गई है। इतिहास गवाह है कि साल 1876-78 के दौरान जब ऐसा ही ‘सुपर अल नीनो’ आया था, तब देश में भीषण अकाल पड़ा था और मानसूनी बेरुखी व तत्कालीन कुप्रबंधन के चलते 55 लाख से अधिक लोगों की अकाल मौत हो गई थी। 148 साल बाद दोबारा वैसी ही आहट ने वैज्ञानिकों और नीति-निर्माताओं को चिंता में डाल दिया है। मौसम विज्ञानियों के अनुसार, सुपर अल नीनो का आम जनजीवन पर तीनतरफा सीधा असर पड़ेगा। भारत की आधी से अधिक खेती आज भी मानसून पर निर्भर है, ऐसे में बारिश कम होने से धान, दलहन और तिलहन की बुआई प्रभावित होगी, जिससे पैदावार घटने से खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ेंगे और आम आदमी पर महंगाई की मार पड़ेगी।
दूसरा बड़ा संकट जल संसाधनों पर मंडरा रहा है; देश के प्रमुख जलाशयों और बांधों में जलस्तर गिरने से सिंचाई के साथ-साथ शहरों और गांवों में पीने के पानी की भारी किल्लत हो सकती है। इसके अलावा, अत्यधिक गर्मी और उमस के कारण देश में बिजली की डिमांड रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाएगी, जबकि बांधों में पानी कम होने से जल विद्युत (हाइड्रोपावर) का उत्पादन घटेगा, जिससे बिजली कटौती का बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि 148 साल पहले और आज के भारत में बहुत बड़ा अंतर है; आज हमारे पास आधुनिक मौसम पूर्वानुमान प्रणाली, अनाज का पर्याप्त बफर स्टॉक और मजबूत आपदा प्रबंधन तकनीक मौजूद है। इसके बावजूद, कृषि और जल संकट से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए सभी राज्यों को अभी से युद्धस्तर पर ‘कंटीजेंसी प्लान’ (आपातकालीन योजना) बनाकर काम शुरू करने की जरूरत है।
